Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 166 / 10

भूरी॑णि भ॒द्रा नर्ये॑षु बा॒हुषु॒ वक्ष॑स्सु रु॒क्मा र॑भ॒सासो॑ अ॒ञ्जय॑:। अंसे॒ष्वेता॑: प॒विषु॑ क्षु॒रा अधि॒ वयो॒ न प॒क्षान्व्यनु॒ श्रियो॑ धिरे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 166 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : मैत्रावरुणोऽगस्त्यः | देवता : मरुतः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : भूरी॑णि। भ॒द्रा। नर्ये॑षु। बा॒हुषु॑। वक्षः॑ऽसु। रु॒क्माः। र॒भ॒सासः॑। अ॒ञ्जयः॑। अंसे॑षु। एताः॑। प॒विषु॑। क्षु॒राः। अधि॑। वयः॑। न। प॒क्षान्। वि। अनु॑। श्रियः॑। धि॒रे॒ ॥ १.१६६.१०

पदार्थ : जिनके (नर्येषु) मनुष्यों के लिये हितरूप पदार्थों में (भूरीणि) बहुत (भद्रा) सेवन करने योग्य धर्मयुक्त कर्म वा (बाहुषु) प्रचण्ड भुजदण्डों और (वक्षस्सु) वक्षःस्थलों में (रुक्माः) सुवर्ण और रत्नादियुक्त अलङ्कार (अंसेषु) स्कन्धों में (एताः) विद्या की शिक्षा में प्राप्त (रभसासः) वेग जिनमें विद्यमान ऐसे (अञ्जयः) प्रसिद्ध प्रशंसायुक्त पदार्थ (पविषु, अधि) उत्तम शिक्षायुक्त वाणियों में (क्षुराः) धर्मानुकूल शब्द वर्त्तमान हैं वे (वयः) पखेरू (पक्षान्) पंखों को (न) जैसे वैसे (श्रियः) लक्ष्मियों को (वि, अनु, धिरे) विशेषता से अनुकूल धारण करते हैं ॥ १० ॥

भावार्थ : जो ब्रह्मचर्य से विद्याओं को प्राप्त हुए, गृहाश्रम में आभूषणों को धारण किये पुरुषार्थयुक्त परोपकारी, वानप्रस्थाश्रम में वैराग्य को प्राप्त पढ़ाने में रमे हुए और संन्यास आश्रम में प्राप्त हुआ यथार्थभाव जिनको और परोपकारी सर्वत्र विचरते सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग कराते हुए समस्त मनुष्यों को बढ़ाते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥