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Rigveda / 1 / 166 / 13

तद्वो॑ जामि॒त्वं म॑रुत॒: परे॑ यु॒गे पु॒रू यच्छंस॑ममृतास॒ आव॑त। अ॒या धि॒या मन॑वे श्रु॒ष्टिमाव्या॑ सा॒कं नरो॑ दं॒सनै॒रा चि॑कित्रिरे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 166 | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : मैत्रावरुणोऽगस्त्यः | देवता : मरुतः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : तत्। वः॒। जा॒मि॒ऽत्वम्। म॒रु॒तः॒। परे॑। यु॒गे। पु॒रु। यत्। शंस॑म्। अ॒मृ॒ता॒सः॒। आव॑त। अ॒या। धि॒या। मन॑वे। श्रु॒ष्टिम्। आव्य॑। सा॒कम्। नरः॑। दं॒सनैः॑। आ। चि॒कि॒त्रि॒रे॒ ॥ १.१६६.१३

पदार्थ : हे (अमृतासः) मृत्युधर्मरहित (मरुतः) प्राणों के समान अत्यन्त प्रिय विद्वान् जनो ! (परे, युगे) परले वर्ष में वा परजन्म में (यत्) जो (वः) तुम लोगों का (पुरु) बहुत (जामित्वम्) सुख-दुःख का भोग वर्त्तमान है (तत्) उसको (शंसम्) प्रशंसारूप (आवत) रक्खो और (अया) इस (धिया) बुद्धि से (मनवे) मनुष्य के लिये (श्रुष्टिम्) प्राप्त होने योग्य वस्तु की (आव्य) रक्षा कर (नरः) धर्मयुक्त व्यवहारों में मनुष्यों को पहुँचानेवाले मनुष्य (साकम्) तुम्हारे साथ (दंसनैः) शुभ-अशुभ सुख-दुःख फलों की प्राप्ति करानेवाले कर्मों से (आ, चिकित्रिरे) सबको अच्छे प्रकार जानें ॥ १३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वायु इस सृष्टि में और वर्त्तमान प्रलय में वर्त्तमान हैं, वैसे नित्य जीव हैं तथा जैसे वायु जड़ वस्तु को भी नीचे ऊपर पहुँचाते हैं, वैसे जीव भी कर्मों के साथ पिछले, बीच के और अगले समय में समय और अपने कर्मों के अनुसार चक्कर खाते फिरते हैं ॥ १३ ॥