Rigveda / 9 / 62 / 9
त्वमि॑न्दो॒ परि॑ स्रव॒ स्वादि॑ष्ठो॒ अङ्गि॑रोभ्यः । व॒रि॒वो॒विद्घृ॒तं पय॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 62 | Mantra No : 9
In English:
Seer : jamadagniH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tvamindo pari srava svaadiShTho a~NgirobhyaH . varivovidghRRita.m payaH .
Component Words : tvam . indo iti . pari . srava . svaadiShThaH . a~NgiraH.abhyaH . varivaH.avit . ghRRitam . payaH . 9.62.9
In Hindi:
ऋषि : जमदग्निः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : त्वम् । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ । स्वादि॑ष्ठः । अङ्गि॑रःऽभ्यः । व॒रि॒वः॒ऽवित् । घृ॒तम् । पयः॑ ॥ ९.६२.९
पदार्थ : (इन्दो) हे तेजस्विन् ! (त्वम्) आप (स्वादिष्ठः) परमप्रिय हैं और (वरिवोविद्) सब प्रजाओं के धनों के प्रापयिता हैं (अङ्गिरोभ्यः) आप विद्वानों के लिये (घृतम् पयः) घृत-दुग्धादि पदार्थ (परिस्रव) उत्पन्न करिये ॥९॥
भावार्थ : प्रजाओं को चाहिये कि वे सदैव अपने राजपुरुषों से ऐश्वर्य की प्रार्थना करके संसार में ऐश्वर्य बढ़ाने का यत्न करें ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : जमदग्निः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : त्वम् । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ । स्वादि॑ष्ठः । अङ्गि॑रःऽभ्यः । व॒रि॒वः॒ऽवित् । घृ॒तम् । पयः॑ ॥ ९.६२.९
भावार्थ :