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Rigveda / 9 / 62 / 18

तं सो॑तारो धन॒स्पृत॑मा॒शुं वाजा॑य॒ यात॑वे । हरिं॑ हिनोत वा॒जिन॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 62 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : जमदग्निः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : तम् । सो॒ता॒रः॒ । ध॒न॒ऽस्पृत॑म् । आ॒शुम् । वाजा॑य । यात॑वे । हरि॑म् । हि॒नो॒त॒ । वा॒जिन॑म् ॥ ९.६२.१८

पदार्थ : (सोतारः) हे अमात्यादि अभिषेक्ता लोगों ! (धनस्पृतम्) जो कि धनों का संचय करनेवाला है तथा (आशुम्) बहुव्यापी है (हरिम्) और शत्रुओं का विघातक (वाजिनम्) सुन्दर बलवाला है, उसको (वाजाय) शक्ति बढ़ाने को (यातवे) यात्रा करने के लिये (हिनोत) प्रेरणा करो ॥१८॥

भावार्थ : हे प्रजाजनों ! तुम लोग जो उक्तगुणसम्पन्न पुरुष है, उसको अपने अभ्युदय के लिये सेनाधीशादि पदों पर नियुक्त करो ॥१८॥