Rigveda / 9 / 64 / 8
के॒तुं कृ॒ण्वन्दि॒वस्परि॒ विश्वा॑ रू॒पाभ्य॑र्षसि । स॒मु॒द्रः सो॑म पिन्वसे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 64 | Mantra No : 8
In English:
Seer : kashyapaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ketu.m kRRiNvandivaspari vishvaa ruupaabhyarShasi . samudraH soma pinvase .
Component Words : ketum . kRRiNvan . divaH . pari . vishvaa . ruupaa . abhi . aarShasi . samudraH . soma . pinvase . 9.64.8
In Hindi:
ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : के॒तुम् । कृ॒ण्वन् । दि॒वः । परि॑ । विश्वा॑ । रू॒पा । अ॒भि । आ॒र्ष॒सि॒ । स॒मु॒द्रः । सो॒म॒ । पि॒न्व॒से॒ ॥ ९.६४.८
पदार्थ : (सोम) हे सौम्यस्वभाव परमात्मन् ! (दिवस्परि) द्युलोक के ऊपर (केतुं कृण्वन्) सूर्य तथा चन्द्रमा को आपने केतुरूप बनाया है और (विश्वा रूपा) सम्पूर्ण रूपों को (अभ्यर्षसि) पवित्र बनाया है। जिससे सब आनन्द मिलते हैं, उसका नाम यहाँ समुद्र है, (पिन्वसे) वह आप सब प्रकार के ऐश्वर्यों को हमारे लिये देते हैं ॥८॥
भावार्थ : परमात्मा ने अपनी रचना में सूर्य तथा चन्द्रमा को प्रकाश के केतु बनाकर संसार की शोभा को बढ़ाया है और आनन्द का सागर होने से परमात्मा का नाम समुद्र है ॥८॥
In Sanskrit:
ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : के॒तुम् । कृ॒ण्वन् । दि॒वः । परि॑ । विश्वा॑ । रू॒पा । अ॒भि । आ॒र्ष॒सि॒ । स॒मु॒द्रः । सो॒म॒ । पि॒न्व॒से॒ ॥ ९.६४.८
भावार्थ :