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Rigveda / 9 / 64 / 16

प्र हि॑न्वा॒नास॒ इन्द॒वोऽच्छा॑ समु॒द्रमा॒शव॑: । धि॒या जू॒ता अ॑सृक्षत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 64 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : प्र । हि॒न्वा॒नासः॑ । इन्द॑वः । अच्छ॑ । स॒मु॒द्रम् । आ॒शवः॑ । धि॒या । जू॒ताः । अ॒सृ॒क्ष॒त॒ ॥ ९.६४.१६

पदार्थ : (धिया) संस्कृत बुद्धि से (जूताः) उपासना किया हुआ (आशवः) गतिशील (अच्छा) निर्मल परमात्मा (समुद्रम्) द्रवीभूत मन से (प्रासृक्षत) ध्यान को लक्ष्य बनाता है। उक्त परमात्मा (इन्दवः) सब प्रकार ऐश्वर्यवाला है तथा (हिन्वानासः) सबकी प्रेरणा करनेवाला है ॥१६॥

भावार्थ : सर्वप्रकाशक और सबका प्रेरक परमात्मा संयमी पुरुषों के ध्यान का विषय होता है, अन्यों के नहीं ॥१६॥