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Rigveda / 9 / 65 / 14

आ क॒लशा॑ अनूष॒तेन्दो॒ धारा॑भि॒रोज॑सा । एन्द्र॑स्य पी॒तये॑ विश ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 65 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : आ । क॒लशाः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ । इन्दो॒ इति॑ । धारा॑भिः । ओज॑सा । आ । इन्द्र॑स्य । पी॒तये॑ । वि॒श॒ ॥ ९.६५.१४

पदार्थ : (इन्दो) हे सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! आप (धाराभिः) आनन्द की वृष्टि द्वारा (इन्द्रस्य पीतये) कर्मयोगी की तृप्ति के लिये (कलशाः) उसके अन्तःकरण में (आ विश) सब ओर से प्रवेश करें और (ओजसा) अपने प्रकाश से कर्मयोगी को (अनूषत) विभूषित करें ॥१४॥

भावार्थ : जो पुरुष कर्म करने में तत्पर रहते हैं अर्थात् उद्योगी हैं, परमात्मा उनको अपने प्रकाश से परमोद्योगी बनाता है ॥१४॥