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Rigveda / 1 / 167 / 10

व॒यम॒द्येन्द्र॑स्य॒ प्रेष्ठा॑ व॒यं श्वो वो॑चेमहि सम॒र्ये। व॒यं पु॒रा महि॑ च नो॒ अनु॒ द्यून्तन्न॑ ऋभु॒क्षा न॒रामनु॑ ष्यात् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 167 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रो मरुच्च | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : व॒यम्। अ॒द्य। इन्द्र॑स्य। प्रेष्ठाः॑। व॒यम्। श्वः। वो॒चे॒म॒हि॒। स॒ऽम॒र्ये। व॒यम्। पु॒रा। महि॑। च॒। नः॒। अनु॑। द्यून्। तत्। नः॒। ऋ॒भु॒क्षाः। न॒राम्। अनु॑। स्या॒त् ॥ १.१६७.१०

पदार्थ : हे विद्वानो ! (वयम्) हम लोग (अद्य) आज (इन्द्रस्य) परमविद्या और ऐश्वर्ययुक्त धार्मिक विद्वान् के (प्रेष्ठाः) अत्यन्त प्रिय हैं (वयम्) हम लोग (श्वः) कल्ह के आनेवाले दिन (समर्य्ये) संग्राम में (वोचेमहि) कहें (च) और (पुरा) प्रथम जो (नः) हम लोगों का (महि) बड़प्पन है (तत्) उसको (वयम्) हम लोग (अनु, द्यून्) प्रतिदिन कहें और (नराम्) मनुष्यों के बीच (नः) हमारे लिये (ऋभुक्षाः) मेधावी बुद्धिमान् वीर पुरुष (अनु, ष्यात्) अनुकूल हो ॥ १० ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वानों से प्रीति, युद्ध में उत्साह और मनुष्यादिकों का प्रिय काम का पहिले से आचरण करते हैं, वे सबके पियारे होते हैं ॥ १० ॥