Rigveda / 9 / 66 / 4
पव॑स्व ज॒नय॒न्निषो॒ऽभि विश्वा॑नि॒ वार्या॑ । सखा॒ सखि॑भ्य ऊ॒तये॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 66 | Mantra No : 4
In English:
Seer : shata.m vaikhaanasaaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : viraaDgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : pavasva janayanniSho.abhi vishvaani vaaryaa . sakhaa sakhibhya uutaye .
Component Words : pavasva . janayan . iShaH . abhi . vishvaani . vaaryaa . sakhaa . sakhi.abhyaH . uutaye . 9.66.4
In Hindi:
ऋषि : शतं वैखानसाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : पव॑स्व । ज॒नय॑न् । इषः॑ । अ॒भि । विश्वा॑नि । वार्या॑ । सखा॑ । सखि॑ऽभ्यः । ऊ॒तये॑ ॥ ९.६६.४
पदार्थ : हे परमात्मन् ! (विश्वानि) सब पदार्थ (वार्या) वरणीय (अभि) सब ओर से आप हमें दें और (इषः) ऐश्वर्य को (जनयन्) पैदा करते हुए (पवस्व) आप हमको पवित्र करें (सखिभ्यः) मित्रों की (ऊतये) रक्षा के लिए (सखा) आप मित्र हैं ॥४॥
भावार्थ : जो लोग परमात्मपरायण होते हैं, परमात्मा उन्हें सब प्रकार के आनन्दों से विभूषित करता है ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : शतं वैखानसाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : पव॑स्व । ज॒नय॑न् । इषः॑ । अ॒भि । विश्वा॑नि । वार्या॑ । सखा॑ । सखि॑ऽभ्यः । ऊ॒तये॑ ॥ ९.६६.४
भावार्थ :