Rigveda / 9 / 68 / 4
स मा॒तरा॑ वि॒चर॑न्वा॒जय॑न्न॒पः प्र मेधि॑रः स्व॒धया॑ पिन्वते प॒दम् । अं॒शुर्यवे॑न पिपिशे य॒तो नृभि॒: सं जा॒मिभि॒र्नस॑ते॒ रक्ष॑ते॒ शिर॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 68 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vatsaprirbhaalandanaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sa maataraa vicharanvaajayannapaH pra medhiraH svadhayaa pinvate padam . a.mshuryavena pipishe yato nRRibhiH sa.m jaamibhirnasate rakShate shiraH .
Component Words : saH . maataraa . vi.acharan . vaaja.ayan . apaH . pra . medhiraH . svadhayaa . pinvate . padam . a.mshuH . yavena . pipishe . yataH . nRRi.abhiH . sam . jaami.abhiH . nasate . rakShate . shiraH . 9.68.4
In Hindi:
ऋषि : वत्सप्रिर्भालन्दनः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : सः । मा॒तरा॑ । वि॒ऽचर॑न् । वा॒जऽय॑न् । अ॒पः । प्र । मेधि॑रः । स्व॒धया॑ । पि॒न्व॒ते॒ । प॒दम् । अं॒शुः । यवे॑न । पि॒पि॒शे॒ । य॒तः । नृऽभिः॑ । सम् । जा॒मिऽभिः॑ । नस॑ते । रक्ष॑ते । शिरः॑ ॥ ९.६८.४
पदार्थ : (सः) वह (मेधिरः) प्राज्ञ कर्मयोगी (मातरा) सब जीवों की माता के समान द्युलोक में तथा पृथिवीलोक में (विचरन्) विचरता हुआ और (अपः) कर्मरूपी योग का (वाजयन्) बल प्रदान करता हुआ (पदं) कर्मयोग के पद को (स्वधया) अनुष्ठानरूप क्रिया से (पिन्वते) पुष्ट करता है। (अंशुः) ज्ञानरूप प्रकाश से प्रदीप्त विद्वान् (यवेन) अपने भाव और अप्ययरूप योग से (पिपिशे) योगाङ्गों को धारण करता है। (यतः) जिससे कर्मयोगी (जामभिः नृभिः) परस्पर संगति बाँध कर चलनेवाले जिज्ञासु द्वारा (सं नसते) अपने कर्तव्य का पालन करता है और (शिरः) पतित पुरुषों की (रक्षते) रक्षा करता है ॥४॥
भावार्थ : कर्मयोगी का यह कर्तव्य है कि वह अकर्मण्यता दोष से ग्रस्त मनुष्यों में उद्योग उत्पन्न करके उनमें जागृति उत्पन्न करे ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वत्सप्रिर्भालन्दनः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : सः । मा॒तरा॑ । वि॒ऽचर॑न् । वा॒जऽय॑न् । अ॒पः । प्र । मेधि॑रः । स्व॒धया॑ । पि॒न्व॒ते॒ । प॒दम् । अं॒शुः । यवे॑न । पि॒पि॒शे॒ । य॒तः । नृऽभिः॑ । सम् । जा॒मिऽभिः॑ । नस॑ते । रक्ष॑ते । शिरः॑ ॥ ९.६८.४
भावार्थ :