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Rigveda / 1 / 168 / 6

क्व॑ स्विद॒स्य रज॑सो म॒हस्परं॒ क्वाव॑रं मरुतो॒ यस्मि॑न्नाय॒य। यच्च्या॒वय॑थ विथु॒रेव॒ संहि॑तं॒ व्यद्रि॑णा पतथ त्वे॒षम॑र्ण॒वम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 168 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : मरुतः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : क्व॑। स्वि॒त्। अ॒स्य। रज॑सः। म॒हः। पर॑म्। क्व॑। अव॑रम्। म॒रु॒तः॒। यस्मि॑न्। आ॒ऽय॒य। यत्। च्य॒वय॑थ। वि॒थु॒राऽइ॑व। सम्ऽहि॑तम्। वि। अद्रि॑णा। प॒त॒थ॒। त्वे॒षम्। अ॒र्ण॒वम् ॥ १.१६८.६

पदार्थ : हे (मरुतः) विद्वानो ! (अस्य) इस (रजसः) भूगोल का (महः) बड़ा (परम्) कारण (क्व, स्वित्) निश्चय से कहाँ और (क्व) कहाँ (अवरम्) कार्य्य वर्त्तमान है इसको हम लोग पूछते हैं (यस्मिन्) जिसमें तुम (आयय) आओ (यत्) जिसको (च्यावयथ) चलाओ जिसमें (विथुरेव) दबाये पदार्थों के समान (संहितम्) मेल किये हुए यह जगत् है जिससे (अद्रिणा) मेघवृन्द के पवन (त्वेषम्) सूर्य के प्रकाश और (अर्णवम्) समुद्र को (वि, पतथ) नीचे प्राप्त होते हैं वही परब्रह्म सब जगत् का बड़ा कारण है, यही उक्त प्रश्नों का उत्तर है ॥ ६ ॥

भावार्थ : जिसमें यह भूगोल आदि जगत् जाता-आता, कम्पता उसीको आकाश के समान कारण जानो, जिसमें ये लोक उत्पन्न होते, भ्रमते और प्रलय हो जाते हैं, वह परम उत्कृष्ट निमित्त कारण ब्रह्म है ॥ ६ ॥