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Rigveda / 9 / 70 / 9

पव॑स्व सोम दे॒ववी॑तये॒ वृषेन्द्र॑स्य॒ हार्दि॑ सोम॒धान॒मा वि॑श । पु॒रा नो॑ बा॒धाद्दु॑रि॒ताति॑ पारय क्षेत्र॒विद्धि दिश॒ आहा॑ विपृच्छ॒ते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 70 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : रेनुर्वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : पव॑स्व । सो॒म॒ । दे॒वऽवी॑तये । वृषा॑ । इन्द्र॑स्य । हार्दि॑ । सो॒म॒ऽधान॑म् । आ । वि॒श॒ । पु॒रा । नः॒ । बा॒धात् । दुः॒ऽइ॒ता । अति॑ । पा॒र॒य॒ । क्षे॒त्र॒ऽवित् । हि । दिशः॑ । आह॑ । वि॒ऽपृ॒च्छ॒ते ॥ ९.७०.९

पदार्थ : (सोम) हे परमात्मन् ! आप (देववीतये) यज्ञादि कर्म के लिये (पवस्व) हमको पवित्र बनायें और (वृषा) आनन्दवर्षक आप (इन्द्रस्य) कर्मयोगी का (सोमधानम्) जो आपकी स्थिति के योग्य मन (हार्दि) सर्वप्रिय है, उसमें (आ विश) आकर प्रवेश करें और जिस प्रकार (क्षेत्रवित्) मार्ग का जाननेवाला पुरुष (विपृच्छते) मार्ग पूछनेवाले को (दिश आह हि) शुभ मार्ग का उपदेश करता है, इसी प्रकार आप (नः) हम लोगों के (बाधात्) पीडन के (दुरिता) पहले ही पापों को (अति पारय) दूर करिये ॥९॥

भावार्थ : परमात्मा जीवों को शुभमार्ग का उपदेश करके आनेवाले दुःखों से पहिले ही बचाता है ॥९॥