Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 71 / 7

परा॒ व्य॑क्तो अरु॒षो दि॒वः क॒विर्वृषा॑ त्रिपृ॒ष्ठो अ॑नविष्ट॒ गा अ॒भि । स॒हस्र॑णीति॒र्यति॑: परा॒यती॑ रे॒भो न पू॒र्वीरु॒षसो॒ वि रा॑जति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 71 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : ऋषभो वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : परा॑ । विऽअ॑क्तः । अ॒रु॒षः । दि॒वः । क॒विः । वृषा॑ । त्रि॒ऽपृ॒ष्ठः । अ॒न॒वि॒ष्ट॒ । गाः । अ॒भि । स॒हस्र॑ऽनीतिः । यतिः॑ । प॒रा॒ऽयतिः॑ । रे॒भः । न । पू॒र्वीः । उ॒षसः॑ । वि । रा॒ज॒ति॒ ॥ ९.७१.७

पदार्थ : (अरुषः) प्रकाशस्वरूप (वृषा) आनन्द का वर्षक (कविः) सर्वज्ञ (व्यक्तः) स्फुट परमात्मा (दिवः परा) द्युलोक से भी परे है। तथा (त्रिपृष्ठः) त्रिकालज्ञ परमात्मा (गाः) उपासनारूपी वाणी को (अभि) लक्ष्य करके (अन्विष्ट) स्थिर है और वह परमेश्वर (सहस्रणीतिः) अनन्त शक्तिवाला है और (यतिः) लोकमर्यादा का हेतु और (परायतिः) सर्वत्र व्याप्त है। परमात्मा (पूर्वी उषसः) अनादिकाल की उषाओं में (रेभो न) प्रकाशमान सूर्य के समान (विराजति) विराजमान है ॥७॥

भावार्थ : अनादिकाल से परमात्मा अनेक उषःकालों को प्रकाशित करता हुआ सर्वत्र विद्यमान है ॥७॥