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Rigveda / 9 / 72 / 9

आ तू न॑ इन्दो श॒तदा॒त्वश्व्यं॑ स॒हस्र॑दातु पशु॒मद्धिर॑ण्यवत् । उप॑ मास्व बृह॒ती रे॒वती॒रिषोऽधि॑ स्तो॒त्रस्य॑ पवमान नो गहि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 72 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : हरिमन्तः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : आ । तु । नः॒ । इ॒न्दो॒ इति॑ । श॒तऽदा॑तु । अश्व्य॑म् । स॒हस्र॑ऽदातु । प॒शु॒ऽमत् । हिर॑ण्यऽवत् । उप॑ । मा॒स्व॒ । बृ॒ह॒तीः । रे॒वतीः॑ । इषः॑ । अधि॑ । स्तो॒त्रस्य॑ । प॒व॒मा॒न॒ । नः॒ । ग॒हि॒ ॥ ९.७२.९

पदार्थ : (इन्दो) प्रकाशरूप परमात्मन् ! आप (शतदातु अश्व्यम्) विद्युदादि सैकड़ों प्रकार के कला-कौशलयुक्त और (सहस्रदातु) सहस्त्रों प्रकार के (पशुमत् हिरण्यवत्) पशु और हिरण्यादियुत धन और (रेवतीः इषः) धनयुक्त ऐश्वर्य (बृहतीः) जो सबसे बड़े हैं, उनको हमारे लिये (उपमास्व) निर्माण करिये। (पवमान) सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (स्तोत्रस्य) उक्त स्तुति के करनेवाले (नः) हमको (अधिगहि) आप ग्रहण करें ॥९॥

भावार्थ : जो पुरुष अपने कर्मयोग और उद्योग के अनन्तर अपने कर्मों को ईश्वरार्पण कर देता है अर्थात् निष्काम भाव से कर्मों को करता है, परमात्मा अवश्यमेव उसका उद्धार करता है ॥९॥ यह ७२ वाँ सूक्त और २८ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥