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Rigveda / 9 / 73 / 2

स॒म्यक्स॒म्यञ्चो॑ महि॒षा अ॑हेषत॒ सिन्धो॑रू॒र्मावधि॑ वे॒ना अ॑वीविपन् । मधो॒र्धारा॑भिर्ज॒नय॑न्तो अ॒र्कमित्प्रि॒यामिन्द्र॑स्य त॒न्व॑मवीवृधन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 73 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : पवित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब असुरों की निन्दा करते हुए और कर्मयोगियों की प्रशंसा करते हुए कहते हैं।

पदपाठ : स॒म्यक् । स॒म्यञ्चः॑ । म॒हि॒षाः । अ॒हे॒ष॒त॒ । सिन्धोः॑ । ऊ॒र्मौ । अधि॑ । वे॒नाः । अ॒वी॒वि॒प॒न् । मधोः॑ । धारा॑भिः । ज॒नय॑न्तः । अ॒र्कम् । इत् । प्रि॒याम् । इन्द्र॑स्य । त॒न्व॑म् । अ॒वी॒वृ॒ध॒न् ॥ ९.७३.२

पदार्थ : (महिषाः) महान् पुरुष (सम्यञ्चः) संगतिवाले (सम्यक्) भली-भाँति (सिन्धोः ऊर्मौ अधि) इस संसाररूपी समुद्र में (वेनाः) अभ्युदय की अभिलाषा करनेवाले (अहेषत) बृद्धि को प्राप्त होते हैं और (अवीविपन्) दुष्टों को कम्पायमान करते हैं। (मधोः धाराभिः) ऐश्वर्य की धाराओं से (जनयन्तः) प्रकट होते हुए तथा (अर्कमित्) अर्चनीय परमात्मा को प्राप्त होते हुए (प्रियाम् इन्द्रस्य तन्वम्) ईश्वर के प्रिय ऐश्वर्य को (अवीवृधन्) बढ़ाते हैं ॥२॥

भावार्थ : जो लोग परमात्मा के महत्त्व को धारण करके महान् पुरुष बनते हैं, वे इस भवसागर की लहरों से पार हो जाते हैं और परमात्मा के यश को गान करके अन्य लोगों को भी अभ्युदयशाली बनाकर इस भवसागर की धार से पार कर देते हैं ॥२॥