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Rigveda / 9 / 76 / 4

विश्व॑स्य॒ राजा॑ पवते स्व॒र्दृश॑ ऋ॒तस्य॑ धी॒तिमृ॑षि॒षाळ॑वीवशत् । यः सूर्य॒स्यासि॑रेण मृ॒ज्यते॑ पि॒ता म॑ती॒नामस॑मष्टकाव्यः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 76 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : विश्व॑स्य । राजा॑ । प॒व॒ते॒ । स्वः॒ऽदृशः॑ । ऋ॒तस्य॑ । धी॒तिम् । ऋ॒षि॒षाट् । अ॒वी॒व॒श॒त् । यः । सूर्य॑स्य । असि॑रेण । मृ॒ज्यते॑ । पि॒ता । म॒ती॒नाम् । अस॑मष्टऽकाव्यः ॥ ९.७६.४

पदार्थ : (विश्वस्य राजा) सम्पूर्ण संसार का राजा परमात्मा (पवते) हमको पवित्र करता है। (ऋतस्य) सत्यवक्ता कर्मयोगी का तथा (स्वर्दृशः) सुख के ज्ञाता के (धीतिम्) कर्म को (अवीविशत्) चाहता है और परमात्मा (ऋषिषाट्) सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है तथा जो परमात्मा (सूर्यस्य) ज्ञान की (असिरेण) रश्मियों से (मृज्यते) साक्षात् किया जाता है और (मतीनाम्) समस्त ज्ञानों का (पिता) प्रदाता है तथा (असमष्टकाव्यः) कवियों की वाणी से परे है ॥४॥

भावार्थ : परमात्मा सब ज्ञानों का केन्द्र है और उसको कोई ज्ञानविषय नहीं कर सकता, इसलिये वह अतीन्द्रिय है अर्थात् “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह” उसको वाणी और मन दोनों ही विषय नहीं कर सकते। अर्थात् वह वाणी का लक्ष्यार्थ है, वाच्यार्थ नहीं ॥४॥