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Rigveda / 9 / 78 / 3

स॒मु॒द्रिया॑ अप्स॒रसो॑ मनी॒षिण॒मासी॑ना अ॒न्तर॒भि सोम॑मक्षरन् । ता ईं॑ हिन्वन्ति ह॒र्म्यस्य॑ स॒क्षणिं॒ याच॑न्ते सु॒म्नं पव॑मान॒मक्षि॑तम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 78 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : कविः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : स॒मु॒द्रियाः॑ । अ॒प्स॒रसः॑ । म॒नी॒षिण॑म् । आसी॑नाः । अ॒न्तः । अ॒भि । सोम॑म् । अ॒क्ष॒र॒न् । ताः । ई॒म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । ह॒र्म्यस्य॑ । स॒क्षणि॑म् । याच॑न्ते । सु॒म्नम् । पव॑मानम् । अक्षि॑तम् ॥ ९.७८.३

पदार्थ : (सोममभि) परमात्मा के समक्ष (समुद्रिया आसीना अप्सरसः) अन्तरिक्ष की स्थिर शक्तियें (अक्षरन्) क्षरण करती हुई (मनीषिणम्) मनस्वी पुरुष के (अन्तः) अन्तःकरण में उद्बोधन करती हैं। वे शक्तियें (ताः) इसको (हिन्वन्ति) प्रेरणा करती हैं और उक्त परमात्मा से (हर्म्यस्य) सब सोन्दर्यों के साधन तथा (सक्षणिम्) सब आपत्तियों के संहारनेवाले (पवमानम्) सबको पवित्र करनेवाले (अक्षितम्) क्षयरहित पद की (याचन्ते) उपासक लोग याचना करते हैं ॥३॥

भावार्थ : विद्युदादि अनन्त शक्तियें अन्तरिक्ष में स्थिर हैं, उनकी याचना न करके लोग अनन्त शक्तिमद् ब्रह्म से अक्षय पद की याचना करते हैं ॥३॥