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Rigveda / 9 / 80 / 1

सोम॑स्य॒ धारा॑ पवते नृ॒चक्ष॑स ऋ॒तेन॑ दे॒वान्ह॑वते दि॒वस्परि॑ । बृह॒स्पते॑ र॒वथे॑ना॒ वि दि॑द्युते समु॒द्रासो॒ न सव॑नानि विव्यचुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 80 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : वसुर्भारद्वाजः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अब परमात्मा के ऐश्वर्य्य को प्रकारान्तर से निरूपण करते हैं।

पदपाठ : सोम॑स्य । धारा॑ । प॒व॒ते॒ । नृ॒ऽचक्ष॑सः । ऋ॒तेन॑ । दे॒वान् । ह॒व॒ते॒ । दि॒वः । परि॑ । बृह॒स्पतेः॑ । र॒वथे॑न । वि । दि॒द्यु॒ते॒ । स॒मु॒द्रासः॑ । न । सव॑नानि । वि॒व्य॒चुः॒ ॥ ९.८०.१

पदार्थ : (नृचक्षसः) परमात्मा के उपासक लोगों के लिये (सोमस्य) सर्वोत्पादक परमात्मा की (धारा) आनन्दमय वृष्टि (पवते) पवित्र करती है और (दिवः देवान्) ज्ञानेच्छुक विद्वान् लोगों को (ऋतेन) शास्त्रीय सत्य द्वारा (परि) सब ओर से (पवते) परमात्मा पवित्र करता है। (बृहस्पतेः) वाणियों के पति विद्वान् को परमात्मा (रवथेन) शब्द से (विदिद्युते) प्रकाशित करता है। (न) जिस प्रकार (समुद्रासः) अन्तरिक्षलोक (सवनानि) यज्ञों का (विव्यचुः) विस्तार करते हैं, इसी प्रकार शब्दविद्या के वेत्ता विद्वान् परमात्मा के ऐश्वर्य्य का विस्तार करते हैं ॥१॥

भावार्थ : मनुष्य को चाहिये कि प्रथम शब्दब्रह्म का ज्ञाता बने, फिर मुख्य ब्रह्म का ज्ञाता बनकर लोगों को सदुपदेश दे ॥१॥