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Rigveda / 9 / 83 / 2

तपो॑ष्प॒वित्रं॒ वित॑तं दि॒वस्प॒दे शोच॑न्तो अस्य॒ तन्त॑वो॒ व्य॑स्थिरन् । अव॑न्त्यस्य पवी॒तार॑मा॒शवो॑ दि॒वस्पृ॒ष्ठमधि॑ तिष्ठन्ति॒ चेत॑सा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 83 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : पवित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : तपोः॑ । प॒वित्र॑म् । विऽत॑तम् । दि॒वः । प॒दे । शोच॑न्तः । अ॒स्य॒ । तन्त॑वः । वि । अ॒स्थि॒र॒न् । अव॑न्ति । अ॒स्य॒ । प॒वी॒तार॑म् । आ॒ऽशवः॑ । दि॒वः । पृ॒ष्थम् । अधि॑ । ति॒ष्ठ॒न्ति॒ । चेत॑सा ॥ ९.८३.२

पदार्थ : हे परमात्मन् ! (दिवस्पदे) द्युलोक में आपका (तपोः) तपोरूपी (पवित्रं) पवित्र (विततं) विस्तृतपद विराजमान है। (अस्य) उस पद की (तन्तवः) किरणें (शोचन्तः) दीप्तिवाली (व्यवस्थिरन्) स्थिर हैं। (अस्य) इस पद के (पवितारं) उपासक को (आशवः) इस पद के आनन्द (अवन्ति) रक्षा करते हैं। उक्त पद के उपासक (दिवस्पृष्ठमधि) द्युलोक के शिखर पर (चेतसा) अपने बुद्धिबल से (तिष्ठन्ति) स्थिर होते हैं ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा ने इस बात का उपदेश किया है कि संसार में तप ही सर्वोपरि है। जो लोग तपस्वी हैं, वे सर्वोपरि उच्च पद को ग्रहण करते हैं, इसलिए हे मनुष्यों तुम तपस्वी बनो ॥२॥