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Rigveda / 9 / 86 / 35

इष॒मूर्जं॑ पवमाना॒भ्य॑र्षसि श्ये॒नो न वंसु॑ क॒लशे॑षु सीदसि । इन्द्रा॑य॒ मद्वा॒ मद्यो॒ मद॑: सु॒तो दि॒वो वि॑ष्ट॒म्भ उ॑प॒मो वि॑चक्ष॒णः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 35

In Hindi:

ऋषि : त्रयऋषिगणाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : इष॑म् । ऊर्ज॑म् । प॒व॒मा॒न॒ । अ॒भि । अ॒र्ष॒सि॒ । श्ये॒नः । न । वंसु॑ । क॒लशे॑षु । सी॒द॒सि॒ । इन्द्रा॑य । मद्वा॑ । मद्यः॑ । मदः॑ । सु॒तः । दि॒वः । वि॒ष्ट॒म्भः । उ॒प॒मः । वि॒ऽच॒क्ष॒णः ॥ ९.८६.३५

पदार्थ : (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (इषं) ऐश्वर्य्य और (ऊर्जं) बल को (अभ्यर्षसि) देते हैं। (श्येनो न ) जिस प्रकार बिजली (वंसु कलशेषु) निवासयोग्य स्थानों में स्थिर होती है, इसी प्रकार (सीदसि) आप पवित्र अन्तःकरणों में स्थिर होते हैं। (इन्द्राय) आप कर्म्मयोगी के लिये (मद्वा) आनन्द करनेवाले (मद्यः) और आनन्द के हेतु हैं। (मदः) स्वयं आनन्दस्वरूप हैं। (सुतः) स्वयंसिद्ध हैं। (दिवो विष्टम्भः) द्युलोक के आधार हैं (उपमः) और द्युलोक की उपमावाले हैं। (विचक्षणः) सर्वोपरि प्रवक्ता हैं ॥३५॥

भावार्थ : परमात्मा द्युभ्वादि लोकों का आधार है और उसी के आधार में चराचर सृष्टि की स्थिति है और वेदादि विद्याओं का प्रवक्ता होने से वह सर्वोपरि विचक्षण है ॥३५॥