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Rigveda / 9 / 87 / 6

परि॒ हि ष्मा॑ पुरुहू॒तो जना॑नां॒ विश्वास॑र॒द्भोज॑ना पू॒यमा॑नः । अथा भ॑र श्येनभृत॒ प्रयां॑सि र॒यिं तुञ्जा॑नो अ॒भि वाज॑मर्ष ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 87 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : उशनाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : परि॑ । हि । स्म॒ । पु॒रु॒ऽहू॒तः । जना॑नाम् । विश्वा॑ । अस॑रत् । भोज॑ना । पू॒यमा॑नः । अथ॑ । आ । भ॒र॒ । श्ये॒न॒ऽभृ॒त॒ । प्रयां॑सि । र॒यिम् । तुञ्जा॑नः । अ॒भि । वाज॑म् । अ॒र्ष॒ ॥ ९.८७.६

पदार्थ : (हि) क्योंकि परमात्मा (पुरुहूतः) सबका उपास्य देव है। (जनानां) मनुष्यों के (विश्वा) सब (भोजना) भोग्य पदार्थों को (पूयमानः) पवित्र करनेवाला (पर्यसरत्) उपासकों के हृदय में आकर विराजमान होता है (अथ) और (श्येनभृत) हे विद्युत् की शक्तियों को धारण करनेवाले परमात्मा ! (प्रयांसि) सब ऐश्वर्यों को (आभर) पूर्ण करो और आप (रयिं) धन को (तुञ्जानः) देनेवाले हैं और आप हमको (वाजं) बल (अभ्यर्ष) सब प्रकार से दें ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा को सर्वैश्वर्य्यप्रदातारूप से वर्णन किया है ॥६॥