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Rigveda / 9 / 87 / 8

ए॒षा य॑यौ पर॒माद॒न्तरद्रे॒: कूचि॑त्स॒तीरू॒र्वे गा वि॑वेद । दि॒वो न वि॒द्युत्स्त॒नय॑न्त्य॒भ्रैः सोम॑स्य ते पवत इन्द्र॒ धारा॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 87 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : उशनाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : एषा । य॒यौ॒ । प॒र॒मात् । अ॒न्तः । अद्रेः॑ । कूऽचि॑त् । स॒तीः । ऊ॒र्वे । गाः । वि॒वे॒द॒ । दि॒वः । न । वि॒ऽद्युत् । स्त॒नय॑न्ती । अ॒भ्रैः । सोम॑स्य । ते॒ । प॒व॒ते॒ । इ॒न्द्र॒ । धारा॑ ॥ ९.८७.८

पदार्थ : (इन्द्र) हे कर्मयोगिन् ! (सोमस्य) सौम्यगुणविशिष्ट परमात्मा की (धाराः) ज्ञान की धारा (ते) तुमको (पवते) पवित्र करे (न) जिस प्रकार (दिवः) द्युलोक से (अभ्रैः) अभ्रों के द्वारा (विद्युत्) बिजली (स्तनयन्ती) शब्द करती हुई विस्तार पाती है, इसी प्रकार परमात्मा की ज्ञानज्योति तुममें विस्तार को प्राप्त हो। (एषा) उक्त धारा (परमादद्रेः) सबको विदीर्ण करनेवाला जो परमात्मा है, उसके (अन्तः) स्वरूप से (कूचित् सतीः) किसी एक स्थान में गूढ़ हुई (ऊर्वे) गूढ़देश में जो (गाः) अपनी सत्ता को (विवेद) लाभ कर रही है, वह (आययौ) उपासक के अन्तःकरण में स्थिर होती है ॥८॥

भावार्थ : परमात्मा अपने भक्त के हृदय में अपने भावों को प्रकाश करता है ॥८॥