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Rigveda / 1 / 171 / 3

स्तु॒तासो॑ नो म॒रुतो॑ मृळयन्तू॒त स्तु॒तो म॒घवा॒ शम्भ॑विष्ठः। ऊ॒र्ध्वा न॑: सन्तु को॒म्या वना॒न्यहा॑नि॒ विश्वा॑ मरुतो जिगी॒षा ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 171 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : मरुतः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : स्तु॒तासः॑। नः॒। म॒रुतः॑। मृ॒ळ॒य॒न्तु॒। उ॒त। स्तु॒तः। म॒घऽवा॑। शम्ऽभ॑विष्ठः। ऊ॒र्ध्वा। नः॒। स॒न्तु॒। को॒म्या। वना॑नि। अहा॑नि। विश्वा॑। म॒रु॒तः॒। जि॒गी॒षा ॥ १.१७१.३

पदार्थ : हे (मरुतः) बलवान् विद्वानो ! हम लोगों से (स्तुतासः) स्तुति किये हुए आप (नः) हमको (मृळयन्तु) सुखी करो (उत) और (स्तुतः) प्रशंसा को प्राप्त होता हुआ (मघवा) सत्कार करने योग्य पुरुष (शम्भविष्ठः) अतीव सुख की भावना करनेवाला हो। हे (मरुतः) शूरवीर जनो ! जैसे (नः) हमारे (विश्वा) समस्त (कोम्या) प्रशंसनीय (जिगीषा) जीतने और (वनानि) सेवने योग्य (अहानि) दिन (ऊर्ध्वा) उत्कृष्ट हैं वैसे तुम्हारे (सन्तु) हों ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिनमें जैसे गुण, कर्म, स्वभाव हों, उनकी वैसी ही प्रशंसा करें और प्रशंसा योग्य वे ही हों जो औरों की सुखोन्नति के लिये प्रयत्न करें और वे ही सेवने योग्य हों जो पापाचरण को छोड़ धार्मिक हों, वे प्रतिदिन विद्या और उत्तम शिक्षा की वृद्धि के अर्थ उद्योगी हों ॥ ३ ॥