Rigveda / 9 / 94 / 4
श्रि॒ये जा॒तः श्रि॒य आ निरि॑याय॒ श्रियं॒ वयो॑ जरि॒तृभ्यो॑ दधाति । श्रियं॒ वसा॑ना अमृत॒त्वमा॑य॒न्भव॑न्ति स॒त्या स॑मि॒था मि॒तद्रौ॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 94 | Mantra No : 4
In English:
Seer : kaNvaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : shriye jaataH shriya aa niriyaaya shriya.m vayo jaritRRibhyo dadhaati . shriya.m vasaanaa amRRitatvamaayanbhavanti satyaa samithaa mitadrau .
Component Words : shriye . jaataH . shriye . aa . niH . iyaaya . shriyam . vayaH . jaritRRi.abhyaH . dadhaati . shriyam . vasaanaaH . amRRita.atvam . aayan . bhavanti . satyaa . sam.aithaa . mita.adrau . 9.94.4
In Hindi:
ऋषि : कण्वः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : श्रि॒ये । जा॒तः । श्रि॒ये । आ । निः । इ॒या॒य॒ । श्रिय॑म् । वयः॑ । ज॒रि॒तृऽभ्यः॑ । द॒धा॒ति॒ । श्रिय॑म् । वसा॑नाः । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । आ॒य॒न् । भव॑न्ति । स॒त्या । स॒म्ऽइ॒था । मि॒तऽद्रौ॑ ॥ ९.९४.४
पदार्थ : वह परमात्मा (श्रिये जातः) ऐश्वर्य्य के लिये सर्वत्र प्रगट है और (श्रियं निरियाय) श्री के लिये ही सर्वत्र गतिशील है और (श्रियं) ऐश्वर्य्य को और (वयः) आयु को (जरितृभ्यः) उपासकों के लिये (दधाति) धारण करता है। (श्रियं वसानाः) श्री को धारण करता हुआ (अमृतत्वमायन्) अमृतत्व को विस्तार करता हुआ (सत्या समिथा) सत्यरूपी यज्ञों के करनेवाला होता है। (मितद्रौ) सर्वज्ञ गतिशील परमात्मा में (सत्या भवन्ति) ब्रह्मयज्ञ चित्त की स्थिरता के हेतु होते हैं ॥४॥
भावार्थ : जो परमात्मोपासक हैं, उनको परमात्मा सब प्रकार का ऐश्वर्य्य देता है ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : कण्वः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : श्रि॒ये । जा॒तः । श्रि॒ये । आ । निः । इ॒या॒य॒ । श्रिय॑म् । वयः॑ । ज॒रि॒तृऽभ्यः॑ । द॒धा॒ति॒ । श्रिय॑म् । वसा॑नाः । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । आ॒य॒न् । भव॑न्ति । स॒त्या । स॒म्ऽइ॒था । मि॒तऽद्रौ॑ ॥ ९.९४.४
भावार्थ :