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Rigveda / 9 / 96 / 8

स म॑त्स॒रः पृ॒त्सु व॒न्वन्नवा॑तः स॒हस्र॑रेता अ॒भि वाज॑मर्ष । इन्द्रा॑येन्दो॒ पव॑मानो मनी॒ष्यं१॒॑शोरू॒र्मिमी॑रय॒ गा इ॑ष॒ण्यन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 96 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : प्रतर्दनो दैवोदासिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सः । म॒त्स॒रः । पृ॒त्ऽसु । व॒न्वन् । अवा॑तः । स॒हस्र॑ऽरेताः । अ॒भि । वाज॑म् । अ॒र्ष॒ । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । पव॑मानः । म॒नी॒षी । अं॒शोः । ऊ॒र्मिम् । ई॒र॒य॒ । गाः । इ॒ष॒ण्यन् ॥ ९.९६.८

पदार्थ : (सः) वह परमात्मा (मत्सरः) आनन्दस्वरूप है। (पृत्सु) यज्ञों में (वन्वन्) सब विघ्नों को नाश करता हुआ (अवातः) निश्चल होकर विराजमान है। (सहस्ररेताः) अनन्त प्रकार के बलों से युक्त है। (वाजम्) सब बलों को (अभि) आश्रय देकर (अर्ष) व्याप्त हो रहा है। (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मन् ! (पवमानः) आप सबको पवित्र करनेवाले हैं, (मनीषी) मन के प्रेरक हैं। (अंशोः, इषण्यन्) इन्द्रियों की प्रेरणा करते हुए (ऊर्मिमीरय) आनन्द की लहरों को हमारी ओर प्रेरित करें ॥८॥

भावार्थ : जो पुरुष अनन्यभक्ति से अर्थात् एकमात्र ईश्वरपरायण होकर ईश्वर की उपासना करते हैं, परमात्मा उन्हें अवश्यमेव आनन्द का प्रदान करता है ॥८॥