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Rigveda / 9 / 97 / 37

आ जागृ॑वि॒र्विप्र॑ ऋ॒ता म॑ती॒नां सोम॑: पुना॒नो अ॑सदच्च॒मूषु॑ । सप॑न्ति॒ यं मि॑थु॒नासो॒ निका॑मा अध्व॒र्यवो॑ रथि॒रास॑: सु॒हस्ता॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 97 | Mantra No : 37

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्त्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : आ । जागृ॑विः । विप्रः॑ । ऋ॒ता । म॒ती॒नाम् । सोमः॑ । पु॒ना॒नः । अ॒स॒द॒त् । च॒मूषु॑ । सप॑न्ति । यम् । मि॒थु॒नासः॑ । निऽका॑माः । अ॒ध्व॒र्यवः॑ । र॒थि॒रासः॑ । सु॒ऽहस्ताः॑ ॥ ९.९७.३७

पदार्थ : (चमूषु) सब प्रकार के बलों को (पुनानः) पवित्र करता हुआ (सोमः) सोमरूप परमात्मा (मतीनाम्) मेधावी लोगों के हृदय में (आ असदत्) विराजमान होता है, वह परमात्मा (ऋता) सत्यस्वरूप है, (विप्रः) मेधावी है, (जागृविः) ज्ञानस्वरूप है, (यम्) जिस परमात्मा को (मिथुनासः) कर्मयोगी और ज्ञानयोगी (निकामाः) जो निष्काम कर्म करनेवाले हैं और (अध्वर्यवः) अहिंसारूपी व्रत को धारण किये हुए हैं, (रथिरासः) ज्ञानी और (सुहस्ताः) कर्मशील हैं, वे प्राप्त होते हैं ॥३७॥

भावार्थ : उक्त विशेषणोंवाले ज्ञानयोगी और कर्मयोगी परमात्मा को प्राप्त होते हैं ॥३७॥