Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 97 / 40

अक्रा॑न्त्समु॒द्रः प्र॑थ॒मे विध॑र्मञ्ज॒नय॑न्प्र॒जा भुव॑नस्य॒ राजा॑ । वृषा॑ प॒वित्रे॒ अधि॒ सानो॒ अव्ये॑ बृ॒हत्सोमो॑ वावृधे सुवा॒न इन्दु॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 97 | Mantra No : 40

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्त्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अक्रा॑न् । स॒मु॒द्रः । प्र॒थ॒मे । विऽध॑र्मन् । ज॒नय॑न् । प्र॒ऽजाः । भुव॑नस्य । राजा॑ । वृषा॑ । प॒वित्रे॑ । अधि॑ । सानौ॑ । अव्ये॑ । बृ॒हत् । सोमः॑ । व॒वृ॒धे॒ । सु॒वा॒नः । इन्दुः॑ ॥ ९.९७.४०

पदार्थ : (समुद्रः) “सम्यग्द्रवन्ति गच्छन्ति भूतानि यस्मात् स समुद्रः परमात्मा”। उससे सब भूतों की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, इसलिये उसका नाम समुद्र है। वह (भुवनस्य) सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों का (राजा) स्वामी परमात्मा (प्रथमे) पहिला (विधर्मन्) जो नाना प्रकार के धर्म्मोंवाला अन्तरिक्ष है, उसमें (प्रजाः) प्रजाओं को (जनयन्) उत्पन्न करता हुआ (अक्रान्) सर्वोपरि होकर विराजमान है। (इन्दुः) वह प्रकाशस्वरूप परमात्मा (सुवानः) सर्वोत्पादक (सोमः) सोमगुणसम्पन्न (बृहत्) जो सबसे बड़ा है, (वृषा) सब कामनाओं का देनेवाला है, वह (अव्ये) रक्षायुक्त (पवित्रे) पवित्र ब्रह्माण्ड के (सानौ) उच्च शिखर में (अधिवावृधे) सर्वव्यापकरूप से विराजमान हो रहा है ॥४०॥

भावार्थ :