Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 98 / 9

स वां॑ य॒ज्ञेषु॑ मानवी॒ इन्दु॑र्जनिष्ट रोदसी । दे॒वो दे॑वी गिरि॒ष्ठा अस्रे॑ध॒न्तं तु॑वि॒ष्वणि॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 98 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : अम्बरीष ऋजिष्वा च | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : सः । वा॒म् । य॒ज्ञेषु॑ । मा॒न॒वी॒ इति॑ । इन्दुः॑ । ज॒नि॒ष्ट॒ । रो॒द॒सी॒ इति॑ । दे॒वः । दे॒वी॒ इति॑ । गि॒रि॒ऽस्थाः । अस्रे॑धन् । तम् । तु॒वि॒ऽस्वनि॑ ॥ ९.९८.९

पदार्थ : (सः) वह उक्त परमात्मा (वाम्) तुम कर्मयोगी और ज्ञानयोगियों के (यज्ञेषु) यज्ञों में (जनिष्ट) शुभफलों को उत्पन्न करता है, इसलिये (मानवी) हे मनुष्यसृष्टि के कर्मयोगी और ज्ञानयोगी विद्वानों ! और (रोदसी) द्युलोक और पृथिवीलोक के मध्य में (देवी) दिव्य गुणवती स्त्रियों ! (इन्दुः) वह प्रकाशस्वरूप परमात्मा (देवः) जो दिव्यगुणयुक्त है, (गिरिष्ठाः) जो सब ब्रह्माण्डों में स्थित है, तुम (तुविष्वणि) ज्ञानयज्ञों में (तम्) उस परमात्मा का (अस्रेधन्) साक्षात्कार करो ॥९॥

भावार्थ : जीवमात्र के शुभ-अशुभ कर्मों के फलों का दाता एकमात्र परमात्मा ही है ॥९॥