Rigveda / 9 / 101 / 4
सु॒तासो॒ मधु॑मत्तमा॒: सोमा॒ इन्द्रा॑य म॒न्दिन॑: । प॒वित्र॑वन्तो अक्षरन्दे॒वान्ग॑च्छन्तु वो॒ मदा॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 101 | Mantra No : 4
In English:
Seer : yayaatirnaahuShaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sutaaso madhumattamaaH somaa indraaya mandinaH . pavitravanto akSharandevaangachChantu vo madaaH .
Component Words : sutaasaH . madhumat.atamaaH . somaaH . indraaya . mandinaH . pavitra.avantaH . akSharan . devaan . gachChantu . vaH . madaaH . 9.101.4
In Hindi:
ऋषि : ययातिर्नाहुषः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : सु॒तासः॑ । मधु॑मत्ऽतमाः । सोमाः॑ । इन्द्रा॑य । म॒न्दिनः॑ । प॒वित्र॑ऽवन्तः । अ॒क्ष॒र॒न् । दे॒वान् । ग॒च्छ॒न्तु॒ । वः॒ । मदाः॑ ॥ ९.१०१.४
पदार्थ : (सुतासः) आविर्भाव को प्राप्त हुए (मधुमत्तमाः) अत्यन्त आनन्दमय (सोमाः) परमात्मा के सौम्य स्वभाव (मन्दिनः) जो अह्लादक हैं, वे (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिये प्राप्त हों और (वः) तुम जो (देवान्) दिव्यगुणयुक्त विद्वान् हो, उनको (मदाः) वह आह्लादक गुण (पवित्रवन्तः) पवित्रतावाले (अक्षरन्) आनन्द की वृष्टि करते हुए (गच्छन्तु) प्राप्त हों ॥४॥
भावार्थ : परमात्मा के अपहतपाप्मादि धर्मों का धारण करना इस मन्त्र में वर्णन किया गया है अर्थात् परमात्मा के सौम्यस्वभावादिकों को जव जीव धारण कर लेता है, तो वह शुद्ध होकर ज्ञानयोगी व कर्मयोगी बन सकता है, अन्यथा नहीं ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : ययातिर्नाहुषः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : सु॒तासः॑ । मधु॑मत्ऽतमाः । सोमाः॑ । इन्द्रा॑य । म॒न्दिनः॑ । प॒वित्र॑ऽवन्तः । अ॒क्ष॒र॒न् । दे॒वान् । ग॒च्छ॒न्तु॒ । वः॒ । मदाः॑ ॥ ९.१०१.४
भावार्थ :