Rigveda / 9 / 101 / 15
स वी॒रो द॑क्ष॒साध॑नो॒ वि यस्त॒स्तम्भ॒ रोद॑सी । हरि॑: प॒वित्रे॑ अव्यत वे॒धा न योनि॑मा॒सद॑म् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 101 | Mantra No : 15
In English:
Seer : prajaapatiH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sa viiro dakShasaadhano vi yastastambha rodasii . hariH pavitre avyata vedhaa na yonimaasadam .
Component Words : saH . viiraH . dakSha.asaadhanaH . vi . yaH . tastambha . rodasii iti . hariH . pavitre . avyata . vedhaaH . na . yonim . aa.asadam . 9.101.15
In Hindi:
ऋषि : प्रजापतिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : सः । वी॒रः । द॒क्ष॒ऽसाध॑नः । वि । यः । त॒स्तम्भ॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । हरिः॑ । प॒वित्रे॑ । अ॒व्य॒त॒ । वे॒धाः । न । योनि॑म् । आ॒ऽसद॑म् ॥ ९.१०१.१५
पदार्थ : (सः) पूर्वोक्त परमात्मा (वीरः) सर्वगुणसम्पन्न है, (दक्षसाधनः) सब चातुर्य्यादि बलों का देनेवाला है, (रोदसी) द्युलोक और पृथिवीलोक को (यः) जो (तस्तम्भ) सहारा दिये खड़ा है, वह (हरिः) सब दुर्गुणों को हनन करनेवाला परमात्मा (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरण में विराजमान होकर (अव्यत) रक्षा करता है, (न) जैसे कि (वेधाः) यजमान (योनिम्) अपने यज्ञमण्डप में (आसदम्) स्थिर होता है, इसी प्रकार परमात्मा पवित्र अन्तःकरणों में ज्ञानगति से प्रविष्ट होकर उनको प्रकाशित करता है ॥१५॥
भावार्थ : जो लोग अपने अन्तःकरणों को पवित्र बनाते हैं अर्थात् मन, बुद्धि आदिकों को शुद्ध करते हैं, उनके अन्तःकरणों में परमात्मा का आविर्भाव होता है ॥१५॥
In Sanskrit:
ऋषि : प्रजापतिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : सः । वी॒रः । द॒क्ष॒ऽसाध॑नः । वि । यः । त॒स्तम्भ॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । हरिः॑ । प॒वित्रे॑ । अ॒व्य॒त॒ । वे॒धाः । न । योनि॑म् । आ॒ऽसद॑म् ॥ ९.१०१.१५
भावार्थ :