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Rigveda / 9 / 103 / 5

परि॒ दैवी॒रनु॑ स्व॒धा इन्द्रे॑ण याहि स॒रथ॑म् । पु॒ना॒नो वा॒घद्वा॒घद्भि॒रम॑र्त्यः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 103 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : द्वितः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : परि॑ । दैवीः॑ । अनु॑ । स्व॒धाः । इन्द्रे॑ण । या॒हि॒ । स॒ऽरथ॑म् । पु॒ना॒नः । वा॒घत् । वा॒घत्ऽभिः । अम॑र्त्यः ॥ ९.१०३.५

पदार्थ : (इन्द्रेण) कर्मयोगी के साथ (सरथम्) समानभाव को प्राप्त होकर (पुनानाः) सबको पवित्र करनेवाला परमात्मा (स्वधाः) स्वधा से सृष्टि करता हुआ (दैवीरनु) दैवी सम्पत्ति के अनुकूल (परियाहि) गमन करता है और (वाघद्भिः) वैदिक लोगों के साथ (वाघत्) सशब्द (अमर्त्यः) अमरणधर्मा परमात्मा अपने प्रकाश्य-प्रकाशकभावरूपी योग से वैदिक लोगों को पवित्र करता है ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में दैवी सम्पत्ति के गुणों का वर्णन किया है ॥५॥