Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 105 / 2

सं व॒त्स इ॑व मा॒तृभि॒रिन्दु॑र्हिन्वा॒नो अ॑ज्यते । दे॒वा॒वीर्मदो॑ म॒तिभि॒: परि॑ष्कृतः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 105 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : पर्वतनारदौ | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : सम् । व॒त्सःऽइ॑व । मा॒तृऽभिः॑ । इन्दुः॑ । हि॒न्वा॒नः । अ॒ज्य॒ते॒ । दे॒व॒ऽअ॒वीः । मदः॑ । म॒तिऽभिः॑ । परि॑ऽकृतः ॥ ९.१०५.२

पदार्थ : (देवावीः) देवताओं का रक्षक (इन्दुः) प्रकाशस्वरूप परमात्मा (हिन्वानः) उपास्यमान (मतिभिः) चित्तवृत्तियों द्वारा (समज्यते) उपासन किया जाता है। वह (मदः, वत्स, इव) परमानन्द के समान (मातृभिः) ज्ञानेन्द्रियों द्वारा (परिष्कृतः) परिष्कार को प्राप्त ध्यान का विषय होता है ॥२॥

भावार्थ : जो लोग अपनी चित्तवृत्तियों को निर्मल करके उस परमात्मा का ध्यान करते हैं, परमात्मा अवश्यमेव उनके ध्यान का विषय होता है ॥२॥