Rigveda / 9 / 107 / 4
पु॒ना॒नः सो॑म॒ धार॑या॒पो वसा॑नो अर्षसि । आ र॑त्न॒धा योनि॑मृ॒तस्य॑ सीद॒स्युत्सो॑ देव हिर॒ण्यय॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 107 | Mantra No : 4
In English:
Seer : saptarShayaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : viraaDbRRihatii | Tone : madhyamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : punaanaH soma dhaarayaapo vasaano arShasi . aa ratnadhaa yonimRRitasya siidasyutso deva hiraNyayaH .
Component Words : punaanaH . soma . dhaarayaa . apaH . vasaanaH . arShasi . aa . ratna.adhaaH . yonim . RRItasya . siidasi . utsaH . deva . hiraNyayaH . 9.107.4
In Hindi:
ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
विषय :
पदपाठ : पु॒ना॒नः । सो॒म॒ । धार॑या । अ॒पः । वसा॑नः । अ॒र्ष॒सि॒ । आ । र॒त्न॒ऽधाः । योनि॑म् । ऋ॒तस्य॑ । सी॒द॒सि॒ । उत्सः॑ । दे॒व॒ । हि॒र॒ण्ययः॑ ॥ ९.१०७.४
पदार्थ : (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (अपः, पुनानः) हमारे कर्मों को पवित्र करते हुए आप (वसानः) हमारे अन्तकरण में निवास करते हुए (धारया) आनन्द की वृष्टि से (अर्षसि) हमको प्राप्त होते हैं। (रत्नधाः) आप सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के धारण करनेवाले हैं, (ऋतस्य, योनिम्) सत्यरूपी यज्ञ के स्थान को (आसीदसि) प्राप्त होते हैं। (देव) हे दिव्यस्वरूप परमात्मन् ! (उत्सः) आप सबका निवासस्थान और (हिरण्ययः) ज्योतिस्वरूप हैं। “अप इति कर्मनामसु पठितम्”, नि. २।१ ॥४॥
भावार्थ : वह ज्योतिस्वरूप परमात्मा अपनी दिव्य ज्योति से उपासक के अज्ञान को छिन्न-भिन्न करके उसमें विमल ज्ञान का प्रकाश करता है ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः
पदपाठ : पु॒ना॒नः । सो॒म॒ । धार॑या । अ॒पः । वसा॑नः । अ॒र्ष॒सि॒ । आ । र॒त्न॒ऽधाः । योनि॑म् । ऋ॒तस्य॑ । सी॒द॒सि॒ । उत्सः॑ । दे॒व॒ । हि॒र॒ण्ययः॑ ॥ ९.१०७.४
भावार्थ :