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Rigveda / 9 / 107 / 8

सोम॑ उ षुवा॒णः सो॒तृभि॒रधि॒ ष्णुभि॒रवी॑नाम् । अश्व॑येव ह॒रिता॑ याति॒ धार॑या म॒न्द्रया॑ याति॒ धार॑या ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 107 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय :

पदपाठ : सोमः॑ । ऊँ॒ इति॑ । सु॒वा॒नः । सो॒तृऽभिः । अधि॑ । स्नुऽभिः॑ । अवी॑नाम् । अश्व॑याऽइव । ह॒रिता॑ । या॒ति॒ । धार॑या । म॒न्द्रया॑ । या॒ति॒ । धार॑या ॥ ९.१०७.८

पदार्थ : आपको साक्षात्कार करनेवाले (सोतृभिः) उपासकों द्वारा (अधि, सुवानः) साक्षात्कार को प्राप्त हुए (सोमः) सर्वोत्पादक आप (अवीनाम्) रक्षायुक्त वस्तुओं के (ष्णुभिः) रक्षायुक्त साधनों से (अश्वया) विद्युत् के (इव) समान (हरिता) कर्मों का अधिष्ठाता परमात्मा (मन्द्रया, धारया) आनन्दित करनेवाली धारा से (याति) उपासकों के अन्तःकरण को प्राप्त होता है ॥८॥

भावार्थ : जिस प्रकार विद्युत् अपनी शक्तियों द्वारा नाना कार्य्यों का हेतु होती है, इसी प्रकार परमात्मा अपने ज्ञान-कर्मरूपी शक्ति द्वारा सब ब्रह्माण्डों की रचना का हेतु है ॥८॥