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Rigveda / 9 / 107 / 21

मृ॒ज्यमा॑नः सुहस्त्य समु॒द्रे वाच॑मिन्वसि । र॒यिं पि॒शङ्गं॑ बहु॒लं पु॑रु॒स्पृहं॒ पव॑माना॒भ्य॑र्षसि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 107 | Mantra No : 21

In Hindi:

ऋषि : सप्तर्षयः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय :

पदपाठ : मृ॒ज्यमा॑नः । सु॒ऽह॒स्त्य॒ । स॒मु॒द्रे । वाच॑म् । इ॒न्व॒सि॒ । र॒यिम् । पि॒शङ्ग॑म् । ब॒हु॒लम् । पु॒रु॒ऽस्पृह॑म् । पव॑मान । अ॒भि । अ॒र्ष॒सि॒ ॥ ९.१०७.२१

पदार्थ : (सुहस्त्य) हे सर्वसामर्थ्यों को हस्तगत करनेवाले परमात्मन् ! आप (समुद्रे) अन्तरिक्ष में (वाचम्) वाणी की (इन्वसि) प्रेरणा करते हैं, (मृज्यमानः) उपासना किये हुए आप (बहुलम्) बहुत सा (पिशङ्गम्) सुवर्णरूपी (रयिम्) धन (पुरुस्पृहम्) जो सबको प्रिय है (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (अभ्यर्षसि) आप देते हैं ॥२१॥

भावार्थ : परमात्मा की उपासना करने से सब प्रकार के ऐश्वर्य मिलते हैं, इसलिये ऐश्वर्य्य की चाहनावाले पुरुष को उसकी उपासना करनी चाहिये ॥२१॥