Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 108 / 14

यस्य॑ न॒ इन्द्र॒: पिबा॒द्यस्य॑ म॒रुतो॒ यस्य॑ वार्य॒मणा॒ भग॑: । आ येन॑ मि॒त्रावरु॑णा॒ करा॑मह॒ एन्द्र॒मव॑से म॒हे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 108 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : शक्तिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : यस्य॑ । नः॒ । इन्द्रः॑ । पिबा॑त् । यस्य॑ । म॒रुतः॑ । यस्य॑ । वा॒ । अ॒र्य॒मणा॑ । भगः॑ । आ । येन॑ । मि॒त्रावरु॑णा । करा॑महे । आ । इन्द्र॑म् । अव॑से । म॒हे ॥ ९.१०८.१४

पदार्थ : (नः) हमारा स्वामी परमात्मा (यस्य) जिसके आनन्द को (इन्द्रः) कर्मयोगी (पिबात्) पान करते, (यस्य) जिसके आनन्द को (मरुतः) विद्वानों का गण पान करता, (यस्य) जिसके आनन्द को (अर्यमणा) कर्मों के साथ (भगः) कर्मयोगी उपलब्ध करता और (येन) जिससे (मित्रावरुणा) अध्यापक तथा उपदेशक (करामहे) सदुपदेश करते हैं, (महे, अवसे) अत्यन्त रक्षा के लिये (इन्द्रम्) कर्मयोगी को जो उत्पन्न करता है, वही हमारा उपास्य देव है ॥१४॥

भावार्थ : जो परमात्मा नाना प्रकार की विद्यायें और इन विद्याओं के वेत्ता कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगियों को उत्पन्न करता, जिससे शिक्षा प्राप्त करके अध्यापक तथा उपदेशक धर्मोपदेश करते और जो दुष्टदमन के लिये रक्षक उत्पन्न करता है, वही हमारा पूजनीय देव है, उसी की उपासना करनी योग्य है ॥१४॥