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Rigveda / 9 / 111 / 2

त्वं त्यत्प॑णी॒नां वि॑दो॒ वसु॒ सं मा॒तृभि॑र्मर्जयसि॒ स्व आ दम॑ ऋ॒तस्य॑ धी॒तिभि॒र्दमे॑ । प॒रा॒वतो॒ न साम॒ तद्यत्रा॒ रण॑न्ति धी॒तय॑: । त्रि॒धातु॑भि॒ररु॑षीभि॒र्वयो॑ दधे॒ रोच॑मानो॒ वयो॑ दधे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 111 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अनानतः पारुच्छेपिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : भुरिगष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय :

पदपाठ : त्वम् । त्यत् । प॒णी॒नाम् । वि॒दः॒ । वसु॑ । सम् । मा॒तृऽभिः॑ । म॒र्ज॒य॒सि॒ । स्वे । आ । दमे॑ । ऋ॒तस्य॑ । धी॒तिऽभिः॑ । दमे॑ । प॒रा॒ऽवतः॑ । न । साम॑ । तत् । यत्र॑ । रण॑न्ति । धी॒तयः॑ । त्रि॒धातु॑ऽभिः । अरु॑षीभिः । वयः॑ । द॒धे॒ । रोच॑मानः । वयः॑ । द॒धे॒ ॥ ९.१११.२

पदार्थ : (यत्र) जिस युद्ध में (धीतयः) युद्धकुशल लोग (परावतः) दूर से ही (रणन्ति) मङ्गलमय गीत गाते हैं, (न) जैसे (साम) सामगान होता है, हे शूरवीर ! (त्वं) तुम (पणीनां) परपक्ष के ऐश्वर्य्यवालों से (त्यत्, वसु) जो धन छीना गया है, उसको (ऋतस्य, धीतिभिः) कर्मयज्ञ द्वारा (विदः) लाभ करके (दमे) अपने वशीभूत करते हो (आ) और (दमे) अपने अधीन धन को (मातृभिः, सं, मर्जयसि) माता पितादत्त शक्ति द्वारा फिर भली-भाँति अर्जन करके (त्रिधातुभिः) तीन धातुओं से बने हुए (अरुषीभिः) कान्तिवाले इस शरीर द्वारा (वयः, दधे) ऐश्वर्य्य को धारण करते हो और (रोचमानः,वयः,दधे) दीप्तिवाले ऐश्वर्य्यशाली होकर स्वतन्त्रतापूर्वक अपने जीवन को आनन्द में परिणत करते हो ॥२॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भावार्थ यह है कि जिस प्रकार ब्रह्मोपासक ब्रह्मयज्ञ में ब्रह्म के ज्ञानादि ऐश्वर्यों को धारण करते हैं, इसी प्रकार शूरवीर कर्मयज्ञ में परमात्मा के अभ्युदयरूप ऐश्वर्य को धारण करते हुए इस त्रिधातुमय शरीर के प्रयत्न को सफल करते हैं ॥२॥