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Rigveda / 9 / 114 / 4

यत्ते॑ राजञ्छृ॒तं ह॒विस्तेन॑ सोमा॒भि र॑क्ष नः । अ॒रा॒ती॒वा मा न॑स्तारी॒न्मो च॑ न॒: किं च॒नाम॑म॒दिन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 114 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : कश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : पङ्क्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : यत् । ते॒ । रा॒ज॒न् । शृ॒तम् । ह॒विः । तेन॑ । सो॒म॒ । अ॒भि । र॒क्ष॒ । नः॒ । अ॒रा॒ति॒ऽवा । मा । नः॒ । ता॒री॒त् । मो इति॑ । च॒ । नः॒ । किम् । च॒न । आ॒म॒म॒त् । इन्द्रा॑य । इ॒न्दो॒ इति॑ । परि॑ । स्र॒व॒ ॥ ९.११४.४

पदार्थ : (राजन्) हे सर्वोपरि विराजमान परमात्मन् ! (ते) तुम्हारा (यत्) जो (शृतम्) परिपक्व (हविः) ज्ञानरूप फल है, (तेन) उसके द्वारा (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! (नः) हमारी (अभि, रक्ष) सर्व प्रकार से रक्षा करें। (अरातिवा) शत्रु लोग (नः) हमको (मा, तारीत्) मत सतावें (च) और (नः) हमारे (किञ्चन) मोक्षसम्बन्धी किसी भी ऐश्वर्य को (मो, आममत्) नष्ट न करें। (इन्दो)  हे परमात्मन् ! (इन्द्राय) कर्मयोगी के लिये (परि, स्रव) सुधा की वृष्टि करें ॥४॥ 

भावार्थ : इस मन्त्र में मुक्तिरूपी फल का उपसंहार करते हुए सब विघ्नों की शान्ति के लिये प्रार्थना की गयी है कि हे सर्वरक्षक भगवन् ! वैदिक कर्म तथा वैदिक अनुष्ठान के विरोधी शत्रुओं से हमारी सब प्रकार से रक्षा करें, ताकि वे हमारे किसी अनुष्ठान में विघ्नकारी न हों और अपनी परम कृपा से मोक्षसम्बन्धी ऐश्वर्य हमें प्रदान करें, यह हमारी आपसे सविनय प्रार्थना है ॥४॥ यह ११४ वाँ सूक्त, सातवाँ अनुवाक और अट्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥ यह श्रीमदार्य्यमुनि के द्वारा उपनिबद्ध ऋक्संहिता के भाष्य में सातवें अष्टक में नवम मण्डल समाप्त हुआ ॥