Rigveda / 10 / 5 / 5
स॒प्त स्वसॄ॒ररु॑षीर्वावशा॒नो वि॒द्वान्मध्व॒ उज्ज॑भारा दृ॒शे कम् । अ॒न्तर्ये॑मे अ॒न्तरि॑क्षे पुरा॒जा इ॒च्छन्व॒व्रिम॑विदत्पूष॒णस्य॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 5 | Mantra No : 5
In English:
Seer : tritaH | Devta : agniH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sapta svasRRIraruShiirvaavashaano vidvaanmadhva ujjabhaaraa dRRishe kam . antaryeme antarikShe puraajaa ichChanvavrimavidatpuuShaNasya .
Component Words : sapta . svasRRIH . aruShiiH . vaavashaanaH . vidvaan . madhvaH . ut . jabhaara . dRRishe . kam . antaH . yeme . antarikShe . puraa.ajaaH . ichChan . vavrim . avidat . puuShaNasya . 10.5.5
In Hindi:
ऋषि : त्रितः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : स॒प्त । स्वसॄः॑ । अरु॑षीः । वा॒व॒शा॒नः । वि॒द्वान् । मध्वः॑ । उत् । ज॒भा॒र॒ । दृ॒शे । कम् । अ॒न्तः । ये॒मे॒ । अ॒न्तरि॑क्षे । पु॒रा॒ऽजाः । इ॒च्छन् । व॒व्रिम् । अ॒वि॒द॒त् । पू॒ष॒णस्य॑ ॥ १०.५.५
पदार्थ : (विद्वान् जानने योग्य अग्निसूर्यरूप (सप्त स्वसॄः-अरुषीः-वावशानः) सात रङ्गवाली अन्धकार को सम्यक् रूप से हटानेवाली आरोचमान रश्मियों को बहुत प्रकाश देता हुआ (दृशे) संसार को दिखाने-दृष्ट करने के लिए (मध्वः-उज्जभार कम्) जलमय आकाश से उभारता है (अन्तरिक्षे-अन्तः-पुराजाः) जो अन्तरिक्ष के अन्दर पूर्व से प्रसिद्ध होता है। (येमे) उन रश्मियों को नियन्त्रित रखता है (पूषणस्य वव्रिम्-इच्छन्-अविदत्) पृथिवी के रूप-स्वरूप को प्रकाशित करने की इच्छा करते हुए जैसा ॥॥
भावार्थ : सूर्य अपनी सात रङ्गवाली किरणों को जगत् को दृष्ट कराने के लिए जलमय आकाश से बाहर निकालता या उभारता है, जो जलमय आकाश में स्वयं प्रथम गुप्त रखता है, पुनः पृथिवी को भी स्वरूप देता है, जल को शोषित कर तथा बहाकर जलमय आकाश में बाहर दृष्ट कराता है। इसी प्रकार सूर्यसमान राजमान राजा सप्त व्यवस्थाओं को राष्ट्र में प्रचारित कर उनसे राष्ट्र को चमकावे, सब प्रकार से पुष्ट करे ॥॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्रितः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : स॒प्त । स्वसॄः॑ । अरु॑षीः । वा॒व॒शा॒नः । वि॒द्वान् । मध्वः॑ । उत् । ज॒भा॒र॒ । दृ॒शे । कम् । अ॒न्तः । ये॒मे॒ । अ॒न्तरि॑क्षे । पु॒रा॒ऽजाः । इ॒च्छन् । व॒व्रिम् । अ॒वि॒द॒त् । पू॒ष॒णस्य॑ ॥ १०.५.५
भावार्थ :