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Rigveda / 10 / 7 / 7

भवा॑ नो अग्नेऽवि॒तोत गो॒पा भवा॑ वय॒स्कृदु॒त नो॑ वयो॒धाः । रास्वा॑ च नः सुमहो ह॒व्यदा॑तिं॒ त्रास्वो॒त न॑स्त॒न्वो॒३॒॑ अप्र॑युच्छन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 7 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : त्रितः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : भव॑ । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒वि॒ता । उ॒त । गो॒पाः । भव॑ । व॒यः॒ऽकृत् । उ॒त । नः॒ । व॒यः॒ऽधाः । रास्व॑ । च॒ । नः॒ । सु॒ऽम॒हः । ह॒व्यऽदा॑तिम् । त्रास्व॑ । उ॒त । नः॒ । त॒न्वः॑ । अप्र॑ऽयुच्छन् ॥ १०.७.७

पदार्थ : (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन् ! तू (नः-अविता-उत-गोपाः-भव) हमारा बहारी भय से रक्षा करनेवाला तथा भीतरी रोग से भी रक्षा करनेवाला हो (नः) हमारा-हमारे में (वयस्कृत्-उत वयोधाः-भव) प्राण का सम्पादक तथा प्राण का धारण करानेवाला हो (सुमहः) हे उत्तमप्रशंसनीय परमात्मन् ! तू (हव्यदातिं रास्व) तेरे प्रति समर्पणयोग्य स्तुतिवचनों के देने की योग्यता को प्रदान कर (उत-नः) और हमारे (तन्वः-अप्रयुच्छन्-त्रास्व) शरीरों की उपेक्षा न करता हुआ रक्षा कर ॥७॥

भावार्थ : अग्रणायक परमात्मा के प्रति स्तुतिवचनों को अर्पित करने से वह बाहरी भयों से और रोगों से बचाता है तथा वही परमात्मा प्राण सञ्चालन करनेवाला व प्राणशक्ति धारण करानेवाला है और वह ही शरीर का भी नित्यरूप से त्राण करनेवाला है ॥७॥