Rigveda / 10 / 8 / 2
मु॒मोद॒ गर्भो॑ वृष॒भः क॒कुद्मा॑नस्रे॒मा व॒त्सः शिमी॑वाँ अरावीत् । स दे॒वता॒त्युद्य॑तानि कृ॒ण्वन्त्स्वेषु॒ क्षये॑षु प्रथ॒मो जि॑गाति ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 8 | Mantra No : 2
In English:
Seer : trishiraastvaaShTraH | Devta : agniH | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : mumoda garbho vRRiShabhaH kakudmaanasremaa vatsaH shimiivaa.N araaviit . sa devataatyudyataani kRRiNvantsveShu kShayeShu prathamo jigaati .
Component Words : mumoda . garbhaH . vRRiShabhaH . kakut.amaan . asremaa . vatsaH . shimii.avaan . araaviit . saH . deva.ataati . ut.ayataani . kRRiNvan . sveShu . kShayeShu . prathamaH . jigaati . 10.8.2
In Hindi:
ऋषि : त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : मु॒मोद॑ । गर्भः॑ । वृ॒ष॒भः । क॒कुत्ऽमा॑न् । अ॒स्रे॒मा । व॒त्सः । शिमी॑ऽवान् । अ॒रा॒वी॒त् । सः । दे॒वऽता॑ति । उत्ऽय॑तानि । कृ॒ण्वन् । स्वेषु॑ । क्षये॑षु । प्र॒थ॒मः । जि॒गा॒ति॒ ॥ १०.८.२
पदार्थ : (ककुद्मान्) महान् अग्नि, प्रशस्त तेजोवीर्यवाला (वृषभः) प्रकाशसुखवर्षक (गर्भः) द्यावापृथिवीमय जगत् के अन्दर स्थित (मुमोद) विकसित होता है या प्राणियों को सुख पहुँचाता है (अत्सः-अस्रेमा) बच्चा अल्प होता हुआ भी क्षीणबलवाला नहीं-बलवान् है (शिमीवान्-अरावीत्) वह कर्म करनेवाला अपने को घोषित करता है (सः-देवताति) वह दिव्य शक्तिवाला (उद्यतानि कृण्वन्) बलवाले कार्यों को करता हुआ (स्वेषु क्षयेषु प्रथमः-जिगाति) अपने स्थानों में-द्युलोक में सूर्यरूप से, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से, पृथिवी पर अग्निरूप से प्रकृष्टतम-प्रमुख प्राप्त होता है, रहता है ॥२॥
भावार्थ : महान् तेजोबल से सम्पन्न द्यावापृथिवीमय जगत् के अन्दर विकसित हुआ प्राणियों को प्रकाशसुख में बसानेवाला है, वह अल्प होता हुआ भी बलपूर्ण है, बड़े-बड़े बलशाली कार्यों को करनेवाला है। द्युलोक में सूर्यरूप से, अन्तरिक्ष में विद्युद्रूप से, पृथिवी पर अग्निरूप से प्रमुखतया वर्तमान है। राजा या विद्वान् को अग्नि से अनेक प्रकार का कार्य लेकर विविध लाभों को प्राप्त करना चाहिये तथा स्वयं भी उसी की भाँति अन्यों के लिये लाभदायी-उपकारक बनना चाहिये ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : मु॒मोद॑ । गर्भः॑ । वृ॒ष॒भः । क॒कुत्ऽमा॑न् । अ॒स्रे॒मा । व॒त्सः । शिमी॑ऽवान् । अ॒रा॒वी॒त् । सः । दे॒वऽता॑ति । उत्ऽय॑तानि । कृ॒ण्वन् । स्वेषु॑ । क्षये॑षु । प्र॒थ॒मः । जि॒गा॒ति॒ ॥ १०.८.२
भावार्थ :