Rigveda / 10 / 8 / 8
स पित्र्या॒ण्यायु॑धानि वि॒द्वानिन्द्रे॑षित आ॒प्त्यो अ॒भ्य॑युध्यत् । त्रि॒शी॒र्षाणं॑ स॒प्तर॑श्मिं जघ॒न्वान्त्वा॒ष्ट्रस्य॑ चि॒न्निः स॑सृजे त्रि॒तो गाः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 8 | Mantra No : 8
In English:
Seer : trishiraastvaaShTraH | Devta : indra: | Metre : paadanichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sa pitryaaNyaayudhaani vidvaanindreShita aaptyo abhyayudhyat . trishiirShaaNa.m saptarashmi.m jaghanvaantvaaShTrasya chinniH sasRRije trito gaaH .
Component Words : saH . pitryaaNi . aayudhaani . vidvaan . indra.aiShitaH . aaptyaH . abhi . ayudhyat . tri.ashiirShaaNam . sapta.arashmim . jaghanvaan . tvaaShTrasya . chit . niH . sasRRije . tritaH . gaaH . 10.8.8
In Hindi:
ऋषि : त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : सः । पित्र्या॑णि । आयु॑धानि । वि॒द्वान् । इन्द्र॑ऽइषितः । आ॒प्त्यः । अ॒भि । अ॒यु॒ध्य॒त् । त्रि॒ऽशी॒र्षाण॑म् । स॒प्तऽर॑श्मिम् । ज॒घ॒न्वान् । त्वा॒ष्ट्रस्य॑ । चि॒त् । निः । स॒सृ॒जे॒ । त्रि॒तः । गाः ॥ १०.८.८
पदार्थ : (सः-आप्त्यः) वह सर्वज्ञानगुणप्राप्त व्याप्त परमात्मा में स्थित या वर्तमान आत्मा (पित्र्याणि-आयुधानि-विद्वान्) पिता परमात्मा की सङ्गति से प्राप्त अध्यात्मबलरूप शस्त्रों को प्राप्त हुआ (इन्द्रेषितः-अभि-अयुध्यत्) ऐश्वर्यवान् परमात्मा द्वारा प्रेरित-प्रकर्ष को प्राप्त हुआ युद्ध करता है- संघर्ष करता है (त्रिशीर्षाणं सप्तरश्मिं जघन्वान्) तीन शिरोंवाले शरीर के समान स्थूलसूक्ष्मकारण शिरोंवाले शरीर तथा सात रश्मियों-प्रग्रहों-लगामों को अपने-अपने विषयों में लगामों के समान खींचनेवाले ज्ञानेन्द्रियों मन और उपस्थेन्द्रियवाले शरीररूप विरोधी को परास्त करता है-त्यागता है (त्रितः-त्वाष्ट्रस्य गाः-चित्--ससृजे) आत्मा शरीरबीजभाव से उत्पन्न पुनर्जन्म में ले जानेवाली इन्द्रियवासनालगामों को निकाल फेंकता है ॥८॥
भावार्थ : योग द्वारा परमात्मा से आत्मा को अध्यात्मबल प्राप्त होता है, तो स्थूलसूक्ष्मकारणशरीरोंवाले और सात लगामों-पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मन तथा उपस्थेन्द्रियवाले शरीर को वह पराजित करता है। शरीर के कारणरूप गर्भधारण करानेवाले गर्भबीजप्रभाव की वासनाओं को भी निकाल फेंकता है ॥८॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : सः । पित्र्या॑णि । आयु॑धानि । वि॒द्वान् । इन्द्र॑ऽइषितः । आ॒प्त्यः । अ॒भि । अ॒यु॒ध्य॒त् । त्रि॒ऽशी॒र्षाण॑म् । स॒प्तऽर॑श्मिम् । ज॒घ॒न्वान् । त्वा॒ष्ट्रस्य॑ । चि॒त् । निः । स॒सृ॒जे॒ । त्रि॒तः । गाः ॥ १०.८.८
भावार्थ :