Rigveda / 10 / 9 / 9
आपो॑ अ॒द्यान्व॑चारिषं॒ रसे॑न॒ सम॑गस्महि । पय॑स्वानग्न॒ आ ग॑हि॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 9 | Mantra No : 9
In English:
Seer : trishiraastvaaShTraH sindhudviipo vaambariiShaH | Devta : aapaH | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aapo adyaanvachaariSha.m rasena samagasmahi . payasvaanagna aa gahi ta.m maa sa.m sRRija varchasaa .
Component Words : aapaH . adya . anu . achaariSham . rasena . sam . agasmahi . payasvaan . agne . aa . gahi . tam . maa . sam . sRRija . varchasaa . 10.9.9
In Hindi:
ऋषि : त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीपो वाम्बरीषः | देवता : आपः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : आपः॑ । अ॒द्य । अनु॑ । अ॒चा॒रि॒ष॒म् । रसे॑न । सम् । अ॒ग॒स्म॒हि॒ । पय॑स्वान् । अ॒ग्ने॒ । आ । ग॒हि॒ । तम् । मा॒ । सम् । सृ॒ज॒ । वर्च॑सा ॥ १०.९.९
पदार्थ : (आपः) हे जलो ! (अद्य) इस जीवन में (अनु-अचारिषम्) तुम्हें अनुकूलता से सेवन करता हूँ-बाहर स्नान द्वारा भीतर पान द्वारा (रसेन समगस्महि) तुम्हारे रस-स्पर्श स्वाद-रूप गुण से हम संयुक्त होते हैं, अतः (अग्ने) हे इन जनों के अग्रणायक-प्रेरक स्वामी परमात्मन् ! तू (पयस्वान्-आगहि) तेजस्वी बनकर समन्तरूप से मुझे प्राप्त हो और फिर (तं मा) उस मुझ को (वर्चसा संसृज) तेज से संयुक्त कर ॥९॥
भावार्थ : जलों का ठीक-ठीक सेवन करने से, उचितरूप से स्नान, मार्जन और पान करने से लाभ लेने चाहिएँ। इसी प्रकार आप्त जनों से साक्षात् सत्सङ्ग तथा उपदेश ग्रहण कर अपने बाह्य वातावरण को बनावें और आन्तरिक सुख-शान्ति को प्राप्त करें तथा इन जलों एवं आप्त जनों के स्वामी प्रेरक परमात्मा के तेज आनन्द से अपने को तेजस्वी और आनन्दी बनावें ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीपो वाम्बरीषः | देवता : आपः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : आपः॑ । अ॒द्य । अनु॑ । अ॒चा॒रि॒ष॒म् । रसे॑न । सम् । अ॒ग॒स्म॒हि॒ । पय॑स्वान् । अ॒ग्ने॒ । आ । ग॒हि॒ । तम् । मा॒ । सम् । सृ॒ज॒ । वर्च॑सा ॥ १०.९.९
भावार्थ :