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Rigveda / 10 / 10 / 14

अ॒न्यमू॒ षु त्वं य॑म्य॒न्य उ॒ त्वां परि॑ ष्वजाते॒ लिबु॑जेव वृ॒क्षम् । तस्य॑ वा॒ त्वं मन॑ इ॒च्छा स वा॒ तवाधा॑ कृणुष्व सं॒विदं॒ सुभ॑द्राम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 10 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : यमो वैवस्वतः | देवता : यमी वैवस्वती | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अ॒न्यम् । ऊँ॒ इति॑ । सु । त्वम् । य॒मि॒ । अ॒न्यः । ऊँ॒ इति॑ । त्वाम् । परि॑ । स्व॒जा॒ते॒ । लिबु॑जाऽइव । वृ॒क्षम् । तस्य॑ । वा॒ । त्वम् । मनः॑ । इ॒च्छा । सः । वा॒ । तव॑ । अध॑ । कृ॒णु॒ष्व॒ । स॒म्ऽविद॑म् । सुऽभ॑द्राम् ॥ १०.१०.१४

पदार्थ : (यमि) हे रात्रे ! (सु) हाँ तेरा पूर्वोक्त वचन ठीक है, अतः (त्वम्) तू भी (अन्यम् उ) अन्य पुरुष को (लिबुजा-इव वृक्षम्) लता की नाई वृक्ष को आलिङ्गन कर तथा (अन्य उ) वह अन्य पुरुष भी (त्वाम्) तुझको (परिष्वजाते) आलिङ्गन करे (त्वं वा) और तू (तस्य) उस पुरुष के (मनः) मन को (इच्छ) चाह (सः वा) और वह पुरुष (तव) तेरे मन की चाह करे (अधा) इस के अनन्तर (संविदम्) नियोगरूप प्रतिज्ञा को (सुभद्राम्) अच्छे कल्याणयुक्त अर्थात् सुसन्तानवाली (कृणुष्व) बना ॥१४॥

भावार्थ : सन्तानोपत्ति में असमर्थ होते हुए भी यदि वैराग्यवशात् या परोपकारकार्यवशात् नियोग न करें और संयम से रहें, तो यह अनुचित नहीं, अपितु अधिक अच्छा है ॥१४॥