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Rigveda / 10 / 12 / 3

स्वावृ॑ग्दे॒वस्या॒मृतं॒ यदी॒ गोरतो॑ जा॒तासो॑ धारयन्त उ॒र्वी । विश्वे॑ दे॒वा अनु॒ तत्ते॒ यजु॑र्गुर्दु॒हे यदेनी॑ दि॒व्यं घृ॒तं वाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 12 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : हविर्धान आङ्गिः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : स्वावृ॑क् । दे॒वस्य॑ । अ॒मृत॑म् । यदि॑ । गोः । अतः॑ । जा॒तासः॑ । धा॒र॒य॒न्ते॒ । उ॒र्वी इति॑ । विश्वे॑ । दे॒वाः । अनु॑ । तत् । ते॒ । यजुः॑ । गुः॒ । दु॒हे । यत् । एनी॑ । दि॒व्यम् । घृ॒तम् । वारिति॒ वाः ॥ १०.१२.३

पदार्थ : (गोः देवस्य) सर्वत्र व्यापनशील परमात्मदेव का (स्वावृक्) स्वतःप्राप्त (अमृतम्) अनश्वर सुख को (यत्-इ) यतः (उर्वी) द्यावापृथिवीमय जगत् में (विश्वे देवाः-धारयन्ति) परमात्मा में प्रवेश करनेवाले मुमुक्षु जीवन्मुक्त विद्वान् धारण करते हैं-प्राप्त करते हैं (ते तत्-यजुः-अनुगुः) तेरे इस यजनदान को वे अनुरूपगान प्रशंसन करते हैं (यत्-एनी दिव्यं घृतं वाः-दुहे) जैसे कोई नदी दिव्य तेजस्वी जल को दोह रही होती है ॥३॥

भावार्थ : सर्वत्र व्याप्त परमात्मा के अपने निजी अनश्वर सुख को जीवन्मुक्त धारण करते हैं। उन्हें ऐसा लगता है, जैसे नदी दिव्य जल रिसा रही है। उसे पाकर वे उसका गान स्तवन करते हैं ॥३॥