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Rigveda / 10 / 13 / 5

स॒प्त क्ष॑रन्ति॒ शिश॑वे म॒रुत्व॑ते पि॒त्रे पु॒त्रासो॒ अप्य॑वीवतन्नृ॒तम् । उ॒भे इद॑स्यो॒भय॑स्य राजत उ॒भे य॑तेते उ॒भय॑स्य पुष्यतः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 13 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : विवस्वानादित्यः | देवता : हविर्धाने | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : स॒प्त । क्ष॒र॒न्ति॒ । शिश॑वे । म॒रुत्व॑ते । पि॒त्रे । पु॒त्रासः॑ । अपि॑ । अ॒वी॒व॒त॒न् । ऋ॒तम् । उ॒भे इति॑ । इत् । अ॒स्य॒ । उ॒भय॑स्य । रा॒ज॒तः॒ । उ॒भे इति॑ । य॒ते॒ते॒ इति॑ । उ॒भय॑स्य । पु॒ष्य॒तः॒ ॥ १०.१३.५

पदार्थ : (मरुत्वते शिशवे) प्राणवान् शंसनीय-प्रशंसनीय जीवात्मा के लिए (पित्रे पुत्रासः सप्त क्षरन्ति) पिता समान के लिए पुत्ररूप सर्पणशील प्राण सञ्चार करते हैं (ऋतम्-अपि-अवीवतन्) जीवनयज्ञ को अवश्य वर्ताते हैं-चलाते हैं (अस्य-उभयस्य) इस जीवात्मा के उभयरूप-दोनों रूप, अर्थात् मनुष्यरूप पुनः-पुनः जन्मते हुए तथा देवरूप मुमुक्षु के (उभे-इत्-राजतः) बृहस्पति और यम दोनों स्वामित्व करते हैं, बृहस्पति समागम में और यम प्राणहरण में (यतेते) वे दोनों इस प्रकार यत्न करते हैं, (उभे-उभयस्य पुष्यतः) वे दोनों बृहस्पति और यम दोनों रूपवाले मुमुक्षु और साधारण जन को मुक्ति और भुक्ति फल को देते हैं ॥५॥

भावार्थ : आत्मा जब शरीर धारण करके संसार में प्राणवान् होता है, तब प्राण इसके पुत्र के समान रक्षार्थ सञ्चार करते हैं और जीवनयज्ञ को आगे बढ़ाते हैं। इस जीवात्मा के दो रूपों मुमुक्षुरूप और बारम्बार जन्म लेनेवाले मनुष्यरूप का बृहस्पति और यम स्वामित्व करते हैं और मुक्ति तथा बारम्बार जन्म देकर भुक्ति-भोग फल देते हैं ॥५॥