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Rigveda / 10 / 14 / 12

उ॒रू॒ण॒साव॑सु॒तृपा॑ उदुम्ब॒लौ य॒मस्य॑ दू॒तौ च॑रतो॒ जनाँ॒ अनु॑ । ताव॒स्मभ्यं॑ दृ॒शये॒ सूर्या॑य॒ पुन॑र्दाता॒मसु॑म॒द्येह भ॒द्रम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 14 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : यमः | देवता : श्वानौ | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : उ॒रु॒ऽन॒सौ । अ॒सु॒ऽतृपौ॑ । उ॒दु॒म्ब॒लौ । य॒मस्य॑ । दू॒तौ । च॒र॒तः॒ । जना॑न् । अनु॑ । तौ । अ॒स्मभ्य॑म् । दृ॒शये॑ । सूर्या॑य । पुनः॑ । दा॒ता॒म् । असु॑म् । अ॒द्य । इ॒ह । भ॒द्रम् ॥ १०.१४.१२

पदार्थ : (यमस्य दूतौ-उरूणसौ-असुतृपौ-उदुम्बलौ जनान्-अनु चरतः) वे दिन और रात काल के दूत बने हुए बड़े कुटिल कठोर स्वभाव के, प्राणों से तृप्त होनेवाले महाबली (यह आलङ्कारिक कथन है) उत्पन्न हुए सभी जीवों में साथ-साथ चलते हैं (इह-अस्मम्यं भद्रम्-असु पुनः-दाताम्) वे दिन और रात बारम्बार सूर्यदर्शन के लिये आज इस लोक में हमारे लिये सुखदायक जीवनधारण करने को दूसरा जन्म फिर देवें ॥१२॥

भावार्थ : दिन और रात आयुरूप जीवनकाल के दूत बन कर बारम्बार सूर्यदर्शन कराते हुए जीव को अन्तिम काल तक ले जाते हैं एवं पुनर्जन्म भी धारण कराते हैं ॥१२॥