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Rigveda / 10 / 14 / 16

त्रिक॑द्रुकेभिः पतति॒ षळु॒र्वीरेक॒मिद्बृ॒हत् । त्रि॒ष्टुब्गा॑य॒त्री छन्दां॑सि॒ सर्वा॒ ता य॒म आहि॑ता ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 14 | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : यमः | देवता : यमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : त्रिऽक॑द्रुकेभिः । प॒त॒ति॒ । षट् । उ॒र्वीः । एक॑म् । इत् । बृ॒हत् । त्रि॒ऽस्तुप् । गा॒य॒त्री । छन्दां॑सि । सर्वा॑ । ता । य॒मे । आऽहि॑ता ॥ १०.१४.१६

पदार्थ : (एकम्-इत्-बृहत् त्रिकद्रुकेभिः-षड् उर्वीः पतति) स्वभाव तथा निज स्वतन्त्रता में किसी की अपेक्षा न करनेवाला एक अकेला काल ‘भूत वर्तमान भविष्यत्’ इन तीन कालचक्रों से ऋतुरूप छः भूमियों को प्राप्त होता है (त्रिष्टुब् गायत्री ता सर्वा छन्दांसि यमे-आहिता) द्यावापृथिवी और सारी दिशाएँ अर्थात् अन्तरिक्ष काल के अन्दर ही रखे हुए हैं ॥१६॥

भावार्थ : काल ‘भूत वर्तमान भविष्यत्’ रूप तीनों चक्रों द्वारा छः ऋतुओं में विभक्त हो जाता है। न केवल प्राणियों के लिये ही यह काल यमन करनेवाला है, अपितु पृथिवी, अन्तरिक्ष और द्यौ एवं तीनों लोकों अर्थात् सम्पूर्ण भुवन समय के नियन्त्रण में रहता है, अत एव समय का परिज्ञान और उस के उचित लाभ उठाना चाहिये ॥१६॥