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Rigveda / 10 / 17 / 8

सर॑स्वति॒ या स॒रथं॑ य॒याथ॑ स्व॒धाभि॑र्देवि पि॒तृभि॒र्मद॑न्ती । आ॒सद्या॒स्मिन्ब॒र्हिषि॑ मादयस्वानमी॒वा इष॒ आ धे॑ह्य॒स्मे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 17 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : देवश्रवा यामायनः | देवता : सरस्वती | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सर॑स्वति । या । स॒ऽरथ॑म् । य॒याथ॑ । स्व॒धाभिः॑ । दे॒वि॒ । पि॒तृऽभिः॑ । मद॑न्ती । आ॒ऽसद्य॑ । अ॒स्मिन् । ब॒र्हिषि॑ । मा॒द॒य॒स्व॒ । अ॒न॒मी॒वाः । इषः॑ । आ । धे॒हि॒ । अ॒स्मे इति॑ ॥ १०.१७.८

पदार्थ : (सरस्वति देवि) हे दिव्या स्तुतिवाणी ! (या) जो ये तू (पितृभिः सरथं ययाथ) मनोभावों के साथ समानरमणीय परमात्मा के प्रति जाती है (स्वधाभिः-मदन्ती) वहाँ के आनन्दरसों के साथ हर्षित करती हुई (अस्मिन् बर्हिषि-आसद्य) इस मानस ज्ञानयज्ञ में विराजकर (मादयस्व) हमें हर्षित कर (अस्मे-अनमीवाः-इष-आ धेहि) हमारे लिये रोगरहित कमनीय भोगों को भलीभाँति धारण करा ॥८॥

भावार्थ : मानसिक भावनाओं के साथ जब परमात्मा की स्तुति अध्यात्मयज्ञ में की जाती है, तो वह हमें सब रोगों से अलग रखती हुई कमनीय भोगों को धारण कराती है ॥८॥