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Rigveda / 10 / 17 / 10

आपो॑ अ॒स्मान्मा॒तर॑: शुन्धयन्तु घृ॒तेन॑ नो घृत॒प्व॑: पुनन्तु । विश्वं॒ हि रि॒प्रं प्र॒वह॑न्ति दे॒वीरुदिदा॑भ्य॒: शुचि॒रा पू॒त ए॑मि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 17 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : देवश्रवा यामायनः | देवता : आपः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : आपः । अ॒स्मान् । मा॒तरः॑ । शु॒न्ध॒य॒न्तु॒ । घृ॒तेन॑ । नः॒ । घृ॒त॒ऽप्वः॑ । पु॒न॒न्तु॒ । विश्व॑म् । हि । रि॒प्रम् । प्र॒ऽवह॑न्ति । दे॒वीः । उत् । इत् । आ॒भ्यः॒ । शुचिः॑ । आ । पू॒तः । ए॒मि॒ ॥ १०.१७.१०

पदार्थ : (मातरः-आपः-अस्मान् शुन्धयन्तु) माता के समान स्नेह शान्तिप्रद, जीवनकला निमार्ण करनेवाले जन या आप्त विद्वान् हमें पवित्र करते हैं (घृतप्वः-घृतेन नः पुनन्तु) घृत से सींचते हुए जैसे पवित्र करते हुए जल अथवा तेज से पवित्र करनेवाले आप्त विद्वान् हमें पवित्र करें (विश्वं रिप्रं देवीः प्रवहन्ति) सारे मल दोष को दिव्यगुणवाले जल तथा आप्त विद्वान् पाप को दूर बहाते हैं-दूर करते हैं (इत्) अनन्तर (आभ्यः-“आपूतः शुचिः-उत्-एमि) इनके साथ भलीभाँति सङ्गत होकर पवित्र निर्मल या निष्पाप होता हुआ उन्नत हूँ ॥१०॥

भावार्थ : जल अपने स्नेह से तथा आप्त विद्वान् अपने तेज-ज्ञान से हमें पवित्र किया करते हैं। उनसे यथोचित लाभ लेकर मानव निर्मल व निष्पाप हो जाते हैं और उन्नति के पथ को प्राप्त करते हैं ॥१०॥